वर्ग संघर्ष की ओर बढ़ता झारखंड

मनोज कुमार सिंह
लंबे समय से राज्य की लगभग 20 फीसदी कुर्मी जाति द्वारा एसटी का दर्जा दिए जाने को लेकर संघर्ष और आंदोलन किया जा रहा है। कुर्मी समाज द्वारा एसटी का दर्जा प्राप्त करने के लिए जहां एक ओर कुर्मी जाति के विधायक एवं मंत्री एक मंच पर इकट्ठा हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अब आदिवासी संगठनों के नेता भी इसके विरोध में अपने समाज को गोलबंद कर रहे हैं। लगता है कि अगले कुछ महीनों में सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर यह मामला खुली लड़ाई के रूप में चल पड़ेगा। यह मामला शुक्रवार(9 फरवरी) के राजनीतिक घटनाक्रम और विगत दिनों मोरहाबादी मैदान में लाखों की भीड़ को देख कर उत्पन्न हुई है, रांची के सांसद रामटहल चौधरी, विद्युत वरण महतो एवं राज्य के कुछ विधायकों द्वारा हस्ताक्षरित ज्ञापन को प्रधानमंत्री कार्यालय में सौंपा गया है।

यह सही है कि झारखंड विधानसभा से कुर्मी को एसटी का दर्जा देने संबंधी कोई प्रस्ताव सरकार को नहीं भेजा गया है। लेकिन इस मामले को लेकर आदिवासी संगठनों के भीतर सुगबुगाहट शुरू हो गई है और उनके द्वारा सड़कों पर विरोध शुरू हो गया है। आदिवासी संगठनों को ऐसा लगता है कि यदि कुर्मी को एसटी का दर्जा मिल जाएगा तो यह वर्ग उनके सभी अधिकारों पर कब्जा कर लेगा। इसी क्रम में शुक्रवार को केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की और आदिवासी विकास समिति के अध्यक्ष प्रभाकर के नेतृत्व में एक मार्च निकाला गया। उनका कहना है कि अगर कुर्मी को आदिवासी सूची में शामिल किया गया तो इसका पुरजोर विरोध होगा। उधर, कुर्मी जाति के प्रमुख आंदोलनकारी नेता शीतल ओहदार ने कहा है कि आदिवासी संगठनों का विरोध अनुचित है। दोनों वर्गों के बीच यह जो विरोध का छोटा स्वरूप दिखाई दे रहा है, इसके पीछे राजनीतिज्ञों द्वारा अपनी सुविधा और अपनी सीट बचाने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार के चाल चले जा रहे हैं। यानी राज्य के दो पिछड़े समूह के बीच वर्ग संघर्ष के हालात और बिगड़ेंगे और समाज के असल मुद्दे इन्हीं आंदोलनों, धरनों और प्रदर्शनों के बीच पीसकर रह जाएंगे। हालांकि अगले कुछ दिनों तक यह देखना होगा कि इस वर्ग संघर्ष के बीच में कौन सी पार्टी क्या स्टैंड अपनाती है, क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल केवल एक वर्ग के वोट से अपना भला नहीं कर पाएगी।

राज्य कि कुछ और जातियां भी अपने को आदिवासी का दर्जा देने की मांग लंबे समय से कर रही हैं कोल तेली के मामले में तो मुख्यमंत्री ने टीआरआई से रिपोर्ट भी मांगा है। इसके अलावा घटवार, रजवार और अन्य छोटी-छोटी जातियां अपने को मूलवासी बता कर आदिवासी का दर्जा प्राप्त करने के लिए आंदोलन कर रही हैं। सरकार के पास ऐसे बढ़ते आंदोलनों और धरना-प्रदर्शनों को लेकर रोज मेमोरेंडम दिया जा रहा है ,इस प्रकार की प्रवृत्ति राज्य के लिए खतरे की घंटी भी हो सकती है। इन सब के बीच राज्य में ओबीसी आरक्षण का मामला भी काफी गंभीर स्वरूप ले चुका है। सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के वर्ग संघर्ष के हालात बने रहे तो राज्य अपने मूलभूत विकास के रास्ते से भटक जाएगा और खंडित जनादेश मिलने लगेंगे ,जो झारखंड के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। ऐसे में सरकार को तमाम गैर राजनीतिक संगठनों, कानून के जानकार लोगों को बुलाकर एक साझा मंच तैयार किया जाए और सभी के तर्क और उनकी मांग को एक साथ बैठकर सुलझाने का प्रयास किया जाए, तो संभव है कि समाज को बरगलाने वाले कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं की पोल खुल जाए और लोग राज्य की प्रगति की दिशा में वर्ग संघर्ष के स्थिति से बाहर निकल जाएं।

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