चारा घोटाले का झारखंड सीएस कनेक्शन !

चारा घोटाला इन दिनों सुर्खियों में है पर इसका सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि इस घोटाले से परदा उठाने वाले अमित खरे सीएस की दौड़ में हैं तो वहीं घोटाले को दबाने की कोशिश करने की आरोपी सीएस राजबाला वर्मा विवादों में हैं और कभी भी पद से हटाई जा सकती हैं। सीएस राजबाला ने भी उसी चाईबासा में हुई धांधली पर अपनी चुप्पी साध ली, और सीबीआई के भेजे रिमाइंडर की अनदेखी करती रहीं, जिस चाईबासा में अमित खरे ने इस जालसाजी का उदभेदन किया।

आइये जानते हैं कि आखिर कैसे इस करोड़ों के घोटाले पर से परदा उठा। 27 जनवरी 1996 का दिन, गुलाबी जाड़े का समय था। जिले के तत्कालीन डीसी अमित खरे ने चाईबासा कोषागार, पशुपालन विभाग के कार्यालय और खेतों पर छापेमारी की और विभाग के बिलों को मिलाना शुरू किया तो दंग रह गए। उसमें से सभी बिल 9.9 लाख रुपए के थे और लगभग एक ही वितरक के थे। इतना ही नहीं सभी पहली नजर में ही फर्जी लग रहे थे। जब उन्होंने जिला पशुपालन अधिकारी और उनके सहायकों को इस बारे में बताने के लिए बुलाया तब तक सभी लोग फरार हो चुके थे। इसके बाद अमित खरे खुद ही पशुपालन अधिकारी के कार्यालय अपने मजिस्ट्रेट के साथ जांच करने पहुंचे। नकद, बैंक ड्राफ्ट और नकली ट्रेजरी बिल सब चारों तरफ बिखरे पड़े थे। यह देख कर अमित खरे हैरान रह गए। साफ लग रहा था कि लोग जल्दबाजी में भागे हैं। इसके बाद दोपहर 12 बजे अमित खरे ने अपने मजिस्ट्रेट को आदेश दे दिया कि पशुपालन विभाग के कार्यालय को सील कर दें। वहीं भारतीय स्टेट बैंक की कोषागार शाखा को उन्होंने निर्देश दिया कि वे विभाग के किसी बिल का भुगतान न करें।

इसके साथ ही सभी पुलिस थानों को सतर्क कर दिया। अकाउंटेंट जनरल और राज्य के वित्त विभाग से पूछताछ करने के बाद यह साफ हो गया कि कोषागार से जितनी रकम निकाली गई है वह तो विभाग के लिए आवंटित राज्य के कुल बजट से भी अधिक है। तब अमित खरे ने चारा घोटाले के मुकदमों की श्रृंखला में पहली एफआईआर की। राज्य सरकार के ही अधिकारियों ने वितरकों के साथ मिलकर जालसाजी वाले बिल बनाए और उनका भुगतान भी किया। पूरा प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था उन्हीं लोगों द्वारा पलट दिया गया जिन पर उसकी रक्षा की जिम्मेवारी थी। यह सब कुछ पशुओं का चारा सुनिश्चित करने के नाम पर हुआ। इस मामले की लिपापोती में भी कुछ लोग थे जो नेपत्थ में रह गए। पर इस मामले में एडिशनल डिप्टी कमिश्नर लाल श्यामा चरणनाथ सहदेव ने बड़ी कुशलता से पूरे कोषागारों की जांच की। एसपी वीएच देशमुख ने तुरंत सभी पुलिस थानों को सर्तक किया और ऐसी सुरक्षा व्यवस्था की, की कोई सबूत को बरबाद न कर सके। सदर एसडीओ फिडेलिस टोप्पो और सेकेंड आफिसर विनोदचंद्र झा, पशुपालन विभाग के कार्यालयों को सील कराने में मुख्य भूमिका निभाई।

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *