आरक्षण कार्ड के भरोसे जदयू

नीतीश कुमार के बयान के बाद से निजी क्षेत्र में आरक्षण का मुद्दा लगातार चर्चा में है. जहां एक तरफ कई संगठन और दल आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं वहीं जदयू ने इसे राष्ट्रीय बहस बनाने का फैसला किया है. जदयू का मानना है की सरकारी क्षेत्र में नौकरियां लगातार घट रही है, ऐसे में पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए निजी क्षेत्र में आरक्षण का मार्ग खोला जाना चाहिए. जदयू चाहता है कि आउटसोर्सिंग एजेंसी अपने यहां आरक्षण दे हालांकि इस विचार का कड़ा प्रतिरोध बिहार में हो रहा है. भाजपा समेत कई दलों में आरक्षण के सवाल पर दो फाड़ की स्थिति है.
तमाम विरोधों से बेअसर जदयू नेतृत्व अपने मिशन 2020 में उठाए जाने वाले मुद्दों की तैयारी में जुटा हुआ है. इन मुद्दों में निजी क्षेत्र में आरक्षण का मुद्दा प्रमुख है. जदयू के रणनीतिकारों को लग रहा है कि निजी क्षेत्र में आरक्षण की वकालत कर वह पिछड़ों की हिमायती बन जाएगी हालांकि लालू प्रसाद ने कुछ दिनों पहले यह कह कर नीतीश कुमार पर टिप्पणी की थी कि बिहार में निजी क्षेत्र है ही कहां और नौकरियां कितनी हैं!

जदयू नेता सुजीत यादव ने कहा है कि निजी क्षेत्र में पिछड़ा वर्ग के युवाओं को नौकरी में आरक्षण मिलना ही चाहिए. सुजीत यादव इस मांग के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को धन्यवाद देते हैं और कहते हैं कि सरकारी नौकरी तो मिल नहीं रही, ऐसे में पिछड़ी जमात के युवा आखिर कहां जाएं!

दरअसल जदयू NDA गठबंधन में तो है लेकिन उसे लग रहा है की धीरे धीरे बिहार के राजनीतिक मुद्दे उससे छूटते जा रहे हैं. ऐसे में जदयू ने बिना भाजपा की परवाह किए अपने वोट बैंक के लिए निजी क्षेत्र में आरक्षण का कार्ड खेल दिया है. यह ऐसा कार्ड है जिसका खुले तौर पर भाजपा या कोई और दल विरोध नहीं कर सकता. ऐसे में अगले विधानसभा चुनाव में यह कार्ड जदयू के लिए संजीवनी साबित हो सकता है लेकिन इसके ठीक उलट कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जदयू या कोई और दल झूठे सब्जबाग दिखाकर पिछड़ों का वोट नहीं हासिल कर सकता.

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