साहित्य नहीं बस राजनीतिक नंगापन : स्वराक्षी

स्वराक्षी साहित्य की उन्मुक्त स्वर है। बेलौस लिखना इनकी पहचान है। पेशे से शिक्षक स्वराक्षी स्वरा अनवरत शब्द सृजन में रत हैं। समाज के विविध विषयों पर अपनी कलम चलानेवाली स्वरा साहित्य की राजनीति और इसके क्षरण से काफी दुखी हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश!

साहित्य के इस गिरावट की वजह आप क्या मानती हैं?
उत्तर-
कौन सा साहित्य, कहाँ का साहित्य किस साहित्य के गिरावट की बात कर रहे हैं? साहित्य अब बचा ही कहाँ है, जो उसमे गिरावट आएगी। आज साहित्य के नाम पे तो बस तुकबन्दी औऱ नंगापन ही दिखाई पड़ता है। वो साहित्य जो कभी श्रेष्ठता का प्रतीक माना जाता था, आज बस दिखाऊ और बिकाऊ बन कर रह गया है। चाटुकारिता, फूहड़ता, लोलुपता, स्वार्थता ये सब साहित्य की नई विधाएँ बन कर सामने आई है। और यदि रस की बात करूँ तो आजकल चोर-रस ज्यादा चलन में है। किसी की भी रचना हो बस उसे पढ़ना आना चाहिए, बस वो अपनी हो गयी।
आज जिसे शुद्ध हिंदी का ज्ञान नहीं है, वे राष्ट्रीय कवि कहलाते हैं और अखिल भारतीय सम्मेलनों में शिरकत करते हैं। इसकी एक वजह साहित्य में बढ़ती राजनीतिक हस्तक्षेप भी है। कुछ प्रभुता सम्पन्न अपनी प्रशंसा हेतु कवियों को मोटी रकम देकर रचनाओं का वाचन करवाते हैं, और कवि करते हैं। साहित्यकार उनकी प्रशंसा में लम्बे-लम्बे आलेख लिख कर साहित्य को गर्त में डुबो रहे हैं। उन्हें साहित्य से नहीं बस लिफाफे के वजन से मतलब होता है। साफ शब्दों में कहूँ तो साहित्य के गिरावट की सबसे बड़ी वजह साहित्य का व्यवसायिकरन है।

आप कविता पाठ कब से करती हैं ? कोई प्रेरणा मिली या स्वतः प्रारम्भ किया ?
उत्तर- जी ये तो स्वतः ही आ गयी। शायद एकाकी जीवन ने ज्यादा प्रभावित किया। कहते हैं न कि अकेलापन इस संसार का सबसे बड़ा दुख है, और इस अकेलेपन में लोग या तो पागल या शायर ही होते हैं।
फिर भी मैं छठी वर्ग से ही डायरी लिखा करती थी और ये गुण मुझे अपने माता पिता से मिली, उन्हें भी डायरी लिखने का शौक है। मैंने अपनी रचनाओं को 2016 से प्रकाशित करवाना शुरू किया।

आप अपने बारे में कुछ बताएं।
उत्तर- जी मेरा जन्म 05-02-1992 में हुआ। मैंने स्नातकोत्तर तक की शिक्षा ग्रहण किया है, जिसमे स्नातक (अंग्रेजी) और स्नातकोत्तर (हिंदी) से किया है। वर्तमान में मै बिहार सरकार के अधीन प्रखंड शिक्षिका के रूप में कार्यरत हूँ।

अपने परिवार के बारे में कुछ बताएं।
उत्तर- जी, पिताजी श्री अशोक कुमार झा(एक शिक्षित बेरोजगार हैं)
माताजी श्रीमती सरोज झा एक कुशल गृहिणी हैं।
तीन भाई ,दो बहन और एक प्यारी सी बेटी है।

साहित्य एवं कविता से जुड़े कोई संस्मरण जिसने जिंदगी को प्रभावित किया है?
उत्तर- जी हाँ ऐसे संस्मरण तो कई हैं लेकिन जिसने ज्यादा प्रभावित किया उसका ही जिक्र करूँगी।
दरअसल अपने अकेलेपन की पीड़ा को ही मैं कविताओं में व्यक्त किया करती थी। मन की उद्विग्नता को शांत करने का ये तरीका था, लेकिन ये नहीं जानती थी कि मेरी रचनाएँ किसी और के मन पर भी प्रभाव छोड़ेंगी।
एक कविता मैंने फेसबुक पर साझा किया था, जिसका शीर्षक था ‘तेज़ाब’। उसमे तेज़ाब से पीड़िता के मनोभावों को उकेडा था। आप विश्वास नहीं करेंगे उस रचना को पढ़ कर 3-4 पाठक ने मुझसे निजी वार्ता करके मुझे धन्यवाद ज्ञापित किया, क्योंकि वो किसी से बदला लेने के लिए तेज़ाब का प्रयोग करने वाले थे और मेरी रचना को पढ़ कर उन्हें एहसास हुआ था कि चन्द पल के बदले के कारण जिंदगी कितनी बेरंग हो जाती है। और उन्होंने अपने इरादे बदल लिए, जो मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी और तब से ही मैं साहित्य के प्रति गम्भीर हुई और अपनी जिम्मेदारी को सम्भालने का निरन्तर प्रयास कर रही हूँ।

आपकी कोई उपलब्धि, कोई पुरुस्कार या कोई सम्मान जो अभी तक मिला हो?
उत्तर- जी हाँ, कुछ सम्मान प्राप्त तो हुआ है, किन्तु मुझे नहीं मेरी रचनाओं को और इस लिहाज से ये मेरी नहीं मां शारदे की उपलब्धि है। उनमें से कुछ के नाम- *छैल बिहारी बाण सम्मान, युवा क्वयत्री सम्मान, अटल काव्य सम्मान, मध्यप्रदेश लेखक सम्मान, सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान, साहित्य सारथी सम्मान और भी कई हैं।

क्या टुकड़ो में बंटे बिहार के साहित्यकार शब्द सृजन को प्रभावित नहीं कर रहे हैं?
उत्तर - बिल्कुल प्रभावित कर रहे हैं। आज तक टुकड़ों में बंट कर किसी का भला हुआ है, जो साहित्य का होगा। ये बंटवारे का दंश बिहार और बिहार के साहित्य दोनों झेल रहे हैं। वो बिहार जो कभी साहित्य में अग्रणी होता था। जिसने दिनकर जैसे राष्ट्रीय कवि को साहित्यिक पृष्ठभूमि पे प्रकाशित किया, आज उसी बिहार में साहित्य की ऐसी कालिमा फैली हुई जिसने सर्वत्र अज्ञानता ही फैलाया है। अपनी-अपनी निजता के लिए सबने साहित्य को ‘श्री’ के चरणों मे धकेल दिया।

बिहार में हाल के वर्षों में कोई कालजयी रचना सामने नहीं आई, क्यों?
उत्तर - कैसे आएगी कालजयी रचना! कितने साहित्यकार हैं जो निराला की भाँति केवल रचनाधर्मिता को ही अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म मानते हैं?
आज का साहित्य ,साहित्य न होकर ‘श्री’ हो गया है। मेरा तो मानना है कि अब साहित्य का भी नामकरण कर देना चाहिए। साहित्य के आगे-पीछे श्री लगा देना चाहिए ‘श्री साहित्य श्री’ अर्थात वो साहित्य जो श्री से शुरू होकर श्री पर ही खत्म होता हो (श्री का मतलब तो आप समझ ही रहे होंगे)।

राजनीति गुरु के माध्यम से हमारे साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों, जनमानस को कोई सन्देश।
उत्तर - जी जरूर। राजनीतिक गुरुओं से बस इतना ही कहना चाहूंगी कि साहित्य की आंच पर अपनी राजनीति की रोटी को पकाने की चेष्टा न करें। अपने लाभ के लिए साहित्य की गरिमा को नष्ट न करें क्योंकि यदि साहित्य नष्ट हुआ तो फिर कुछ नहीं बचेगा भारत के पास धरोहर के रूप में। भारत जगतगुरु था और इसे बना रहने दें।
और साहित्यकारों से इतना ही कहूंगी की अपनी कलम को न बेचे, जो आशीर्वाद उन्हें मां वाणी से मिला है, उसका सम्मान करें।
इस संदर्भ में अपनी एक रचना की चार पंक्ति कहना चाहूंगी।

रविंद्र, दिनकर और दीपंकर
अब भी गूंजे जय-जय शंकर
शरत, विवेका बने जहाँ हो
हिन्द के हर दिल का प्यारा

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