फिर से मंडल बनाम कमंडल

नीतीश कुमार तो मंडल से कमंडल हो गए लेकिन साथ होकर भी भाजपा को उलझा गए। बिहार में जो सियासी परिदृश्य दिख रहा है उससे लग रहा है कि बीजेपी एक बार फिर मंडल और कमंडल के जाल में उलझने जा रही है। 2015 में बिहार चुनाव के वक्त संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर बयान को लालू प्रसाद ने हाथों हाथ लपक लिया था। माना गया कि लालू को इसका फायदा भी मिला। लालू ने एक बार फिर इस हथियार को आजमाने के संकेत दिये हैं। मंडल आंदोलन की ही दुहाई देकर लालू ने शरद यादव से साथ देने की भी अपील की है। लालू और तेजस्वी ये तो समझ ही चुके हैं कि भ्रष्टाचार के मामले में वे घिर चुके हैं और ऐसे में कोई भी साथ आने से पहले दो बार सोचेगा जरूर। शरद यादव के भी फैसला लेने में उलझन की यही बड़ी वजह है।

अब तक तो ये तो साफ हो ही चुका है कि लालू प्रसाद की 27 अगस्त की पटना रैली और तेजस्वी की प्रदेश यात्रा का थीम मंडल ही रहने वाला है। बीजेपी ने महागठबंधन तोड़ कर नीतीश को अपने पाले में कर लिया और सत्ता में हिस्सेदारी भी हासिल कर ली है, लेकिन आगे क्या? क्या बीजेपी को बस इतने भर से ही संतोष करना होगा ? बीजेपी का मकसद तो 2019 में 2014 दोहराना और फिर 2020 में नीतीश से ज्यादा से ज्यादा सीटें लेकर लालू प्रसाद की पार्टी को हाशिये पर धकेल देना होगा। क्या ये सब बीजेपी के लिए इतना आसान होगा?

नीतीश ने बीजेपी का हाथ थामकर अपनी राजनीति के लिए कई संकट खड़े कर लिए हैं। इससे लालू यादव के लिए खेल आसान हो जाएगा। लालू ने बहुत परिवारवाद किया है, भ्रष्टाचार के भी आरोप लगते रहे हैं, लेकिन उन्होंने हर बड़े अवसर पर सही राजनीतिक फैसला किया है। नीतीश, नरेंद्र मोदी के मुकाबले छवि की राजनीति करना चाहते थे। इस बार भी वह छवि के नाम पर ही अपने सारे फैसलों का ठीकरा लालू और तेजस्वी पर फोड़ रहे हैं। लेकिन राजनीति में संख्या और सामाजिक-राजनीतिक ताकतों के जोड़ का पारंपरिक तरीका अभी बेअसर नहीं हुआ है।

महागठबंधन द्वारा बिहार में नरेंद्र मोदी को पटखनी देना इसी अंकगणित का नतीजा था। इस घटनाक्रम के बाद लालू-कांग्रेस के लिए इस अंकगणित को फिर से आजमाना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। और अगर यह खेल यूपी तक गया और एसपी, बीएसपी, कांग्रेस एक साथ आ गईं तो बीजेपी को बिहार की इस सफलता की दोगुनी कीमत चुकानी पड़ेगी। मंडल राजनीति की इस विलक्षण संभावना को अभी ठीक से परखा ही नहीं गया है। ऐसे देखा जाये तो नीतीश तो सेट हो गये, लेकिन बीजेपी अभी मंडल और कमंडल की जंग में फंसती जा रही है।

जो भी हो, बुनियादी मुद्दा है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने यूपी-बिहार में 2014 के नतीजों को 2019 में रीपिट करवाने का बंदोबस्त कर लिया है। बिहार में भाजपा-एनडीए को तब 31 सीटें मिली थी। सो 2019 में जब लोकसभा चुनाव होगा तो नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू को भाजपा अधिक से अधिक तब विपक्ष की जीती 7-8 सीटें देगी। ये सीटें ओबीसी-मुस्लिम बहुल हैं। वहां लालू-कांग्रेस की पार्टी उन्हें शायद ही जीतने दे। सो नीतीश के 2-3 सांसद भी चुने जाएं तो बड़ी बात होगी। फिर विधानसभा चुनाव में भाजपा महाराष्ट्र वाला फार्मूला चलाएगी। मतलब भाजपा ऐसी नौबत ला देगी कि खुद अकेले लड़ेगी और जैसे शिवसेना से कहा था कि अकेले लड़ो चुनाव बाद देखेंगे वही नीतीश कुमार के साथ होगा।

इस बीच बिहार के लोग फिर से मंडल, कमंडल के मध्य पीसे जायेंगे। माहौल ख़राब करने की कोशिश होगी। अपने- अपने के दुश्मन होंगे। नीतीश जहां चालाकी से मंडल को महामंडल जैसे खेमे में बाँटना चाहेंगे जैसा उन्होंने दलित को महादलित बनाकर किया था, दूसरी तरफ लालू और कांग्रेस हर कीमत पर मंडल, मुस्लिम एकता को कायम रखने की कोशिश करेंगे।

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