क्या मुश्किल में है रघुवर सरकार!

झारखण्ड सरकार में यूं तो सबकुछ नार्मल ही दिख रहा है लेकिन भाजपा के अंदर से जो खबर छनकर आ रही है, वो तो कुछ और ही बयाँ कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व मुख्यमंत्री पद पर किसी आदिवासी चेहरे को लाना चाहता है। पार्टी के आदिवासी विधायक गोलबंद होकर दिल्ली में हर प्रमुख स्थान पर रघुवर की शिकायत कर चुके हैं। CNT के सवाल पर जिस तरह मुख्यमंत्री को अपना फैसला रोलबेक करना पड़ा, उसके पीछे भी आदिवासी विधायकों का ही विरोध प्रमुख रूप से था। केंद्र को भी लगा कि अगर इसी तरह रघुवर हठधर्मिता दिखाते रहे तो अगले चुनाव में पार्टी की मिट्टी पलीद हो जाएगी।

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव के सामने भी संगठन के पदाधिकारियों ने जमकर मुख्यमंत्री का विरोध किया। राम माधव ने लौटकर दिल्ली को जो रिपोर्ट दी, उसमें भी बताया गया कि सरकार और संगठन के बीच तालमेल की स्पष्ट कमी दिख रही है। विधायक कई बार यह शिकायत कर चुके हैं कि अधिकारी उनकी नहीं सुनते। विधायकों की नाराज़गी तब देखने को मिली जब TAC की बैठक में अधिकारियों को देखते ही सभी भाजपा विधायक आग बबूला हो उठे और उन्होंने मुख्य सचिव समेत अभी अधिकारी को बैठक से बाहर निकलवा दिया। दरअसल अधिकारियों के बूते सरकार चला रहे मुख्यमंत्री रघुवर दास से न तो उनका कोई मंत्री खुश है और न ही ज्यादातर विधायक। संगठन के ही कुछ लोगों ने हाल में एक सर्वे कराया, जिसमें बताया गया कि अगर अभी चुनाव हुए तो भाजपा 10-12 सीटों पर आ जाएगी।

पार्टी सूत्रों के अनुसार तमाम परिस्थितियों को देखकर भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व भी पशोपेश मंी पड़ गया है। अंदरखाने अभी दो-तीन नामों पर विचार हो रहा है। विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव और मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा के नाम विकल्प के तौर पर उछले हैं। हाल के दिनों में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के सम्बन्ध भी दिल्ली से काफी सुधरे हैं। इनके मामले में परेशानी केवल उनकी सीट को लेकर है। केन्द्रीय नेतृत्व अभी ऐसी किसी सीट को लेकर आश्वस्त नहीं है, जहाँ से मुंडा जीत जाएँ। कुल मिलाकर दिनेश उरांव अभी रेस में सबसे आगे हैं। मिलनसार और साफ़ सुथरी छवि के उरांव ने अपनी प्रशासनिक क्षमता भी साबित की है। इन्होने JVM विधायक मामले में लगातार सरकार को बचाए रखा है, नहीं तो 6 विधायक कबके सरकार के गिरने का कारण बन चुके होते।

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