अगर जेपीएससी पर फैसला नहीं होता तो राजनीतिक संकट बढ़ जाता!

29 जनवरी को होनेवाली जेपीएससी की मुख्य परीक्षा टाल दी गयी है. सरकार के इस फैसले से ओबीसी, एससी और एसटी स्टूडेंट्स बहुत खुश हैं. लेकिन इतने दिनों से जेपीएससी पीटी में आरक्षण नहीं देने का विरोध कर रहे लोगों की नहीं सुन रही राज्य सरकार अचानक इस फैसले के लिए कैसे तैयार हो गयी ! जो कार्मिक विभाग लगातार यह तर्क दे रहा था कि बिहार और यूपी में सिविल परीक्षाओं की पीटी में आरक्षण नहीं दिया जा रहा है, उसी विभाग ने रातों-रात कैसे जेपीएससी को पत्र लिख दिया. इस पूरे मामले की असली कहानी अब सामने गयी है.

एक वरिष्ठ भाजपा विधायक ने बताया कि बजट के दिन 17 विधायकों ने मुख्यमंत्री को घेरा. हुआ यूँ कि छात्र संगठनों के दबाव में भाजपा के 17 ओबीसी, एससी और एसटी विधायकों ने सीएम से कहा कि जेपीएससी के मसले पर तुरंत फैसला करें. सीएम ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इन विधायकों को कार्मिक सचिव से बात करने को कहा. विधानसभा में ही कार्मिक सचिव से भाजपा विधायकों की बैठक हुई. वहां फिर वही चर्चा हुई लेकिन विधायक अड़े रहे. विधायकों ने बाद में मुख्यमंत्री को सन्देश भेजवाया कि अगर जेपीएससी पर सरकार तुरंत फैसला नहीं करेगी तो वो बजट की वोटिंग में हिस्सा नहीं लेंगे. इन विधायकों ने रात्रि के 9 बजे तक फैसला लेने की समय सीमा भी दी. इसी शाम अधिकारियों की बैठक बुलाई गयी और फैसला तय हुआ.

एक भाजपा विधायक ने कहा कि मुख्यमंत्री जी ने हम लोगों की भावनाओं को समझा और छात्र हित में फैसला किया. वो कहते हैं कि हमलोगों ने कोई राजनीतिक ब्लैकमैलिंग नहीं की, राज्यहित में एक सवाल सीएम के सामने रखा, जिसे उन्होंने समझा और अधिकारीयों को आवश्यक निर्देश दिए.
हालाँकि इस सम्बन्ध में भाजपा की और से आधिकारिक तौर पर बताया गया कि विधायकों ने अपनी बात रखी थी, इसमें अल्टीमेटम जैसा कुछ नहीं था. यह एक सामान्य प्रक्रिया है, सरकार के सामने ऐसे जनोपयोगी विषय रखे जाते हैं और उसपर फैसला भी होता है .

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