2018 में राजनीतिक दुविधा से कैसे निकले झारखंड

कभी सरकार के फैसलों को लेकर तो कभी सत्ताधारी नेताओं की बयानबाजी के कारण झारखंड सुर्खियों में रहा। साल 2017 जाते-जाते कई मुद्दे छोड़ गया, जिस पर आगे सियासत होना लाजिमी है। सीएनटी-एसपीटी और स्थानीयता पर शुरू हुआ विवाद बीजेपी के लिए भारी पड़ा और अंततः रघुवर सरकार को सीएनटी पर कदम पीछे खींचना पड़ा। वहीं स्थानीयता और भूमि अधिग्रहण बिल पर घिरी सरकार के मुखिया ने सदन के शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन विपक्ष पर अभद्र टिप्पणी कर पूरे विवाद को और गहरा दिया। आपसी सियासी फायदे के लिए बिखरा विपक्ष एकजुट हो गया इससे सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को बैकफुट पर आना पड़ा।

किसानों और गरीब आदिवासियों की जमीन जबरन छीनने को मुद्दा बनाकर झामुमो और झाविमो जैसी पार्टियों ने रघुवर सरकार की खूब किरकिरी की। वहीं धर्मांतरण मुद्दे पर सामाजिक संगठऩों के निशाने पर रही सरकार को बार-बार अपने स्टैंड को क्लियर करना पड़ा। एनडीए की नेतृत्ववाली रघुवर सरकार ने पिछले तीन सालों में जो भी कार्य किए उसका असर जमीन पर चाहे जितना हुआ हो पर बीजेपी की अपनी सियासी जमीन को बरकरार रखने की चुनौती तो जरूर पहले से ज्यादा बढ़ी है। राज्य के कुछ हिस्सों में रघुवर सरकार ने योजनाओं की घोषणा का जो अंबार लगाया है उससे हो सकता है कि राजनीतिक फायदा हो लेकिन ये भी संभव है कि उससे ज्यादा नुकसान सरकारी तंत्र की लापरवाही से हुआ हो।

उधर सरकार की नाकामियों और जनता की परेशानियों को विपक्ष ने उठाया तो जरूर है पर उसके पास बीजेपी को माकूल जवाब देने का सुनियोजित रणनीति नहीं है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास के अमर्यादित बयानों पर वह तीखा हमला तो करती है पर उसे जनता के सामने मुद्दा बनाने में असफल दिखती है। हालांकि कई मुद्दों पर एकजुट विपक्ष की रणनीति काम आयी है और बीजेपी फंसती नजर आयी है। वहीं सरकार को भी अपने फैसलों पर यू-टर्न लेना पड़ा है। लेकिन लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं है ऐसे में बीजेपी के मिशन 14 और 60 प्लस पर समूचे विपक्ष को विशेष स्ट्रैटजी बनाना होगा।

बीजेपी के प्रोपेगेंडा रणनीति का जवाब देने के लिए हर स्तर पर तैयारी करनी होगी। सोशल मीडिया से लेकर बूथ स्तर तक मजबूत किला बंदी से ही बीजेपी के सियासी जुमलों के असर को कम किया जा सकता है। बहरहाल, झामुमो, कांग्रेस, झाविमो और राजद के सामने सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी के सामने अपने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत कर उन्हें तैयार करने की है। क्योंकि भाजपा इस मामले में आज किसी भी अन्य दलों से ज्यादा सशक्त स्थिति में है। बीजेपी वैसे इलाकों में भी खूब काम कर रही है जहां उसकी पकड़ कमजोर है, सरकार की योजनाएं बड़े स्तर पर चलाई जा रही हैं जिससे लोगों का दिल जीता जाए।

इन सब के बीच विपक्ष को यह जरूर याद रखना होगा कि बीजेपी आज देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। और पूरे देश में वह जिस चेहरे पीएम मोदी को भुना रही है हो सकता है उसका असर कम हो, लेकिन खत्म नहीं हुआ है।

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