खत्म हुआ HEC बचाने का नाटक

मनोज कुमार सिंह
8 फरवरी से एचईसी के संबंध में जो राजनीतिक ड्रामा की पृष्ठभूमि लिखी गई थी उसका अन्त कल हो गया। एचईसी के सीएमडी अभिजीत घोष ने बताया कि अब एचईसी का निजीकरण नहीं होगा और नहीं बिकेगा। इसका श्रेय रांची के सांसद रामटहल चौधरी, जमशेदपुर के सांसद विद्युत वरण महतो और राज्यसभा के सांसद महेश पोद्दार अपने-अपने स्तर से लेने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि एचईसी के मामले को लेकर ऐसा कुछ नहीं हुआ था जिसका श्रेय कोई राजनेता या राज्य सरकार ले।

जिस दिन से मामला समाचार पत्रों के माध्यम से उछाला गया था राजनीतिक गुरु ने उसी समय इस खबर के पीछे की असली मनसा को उजागर कर दिया था यहां तक कि किन कारणों से यह मुद्दे उठाए गए थे इस पर भी प्रकाश डाला था। यदि उन खबरों का सही मूल्यांकन किया जाए तो परिणाम भी वैसे ही दिखाई दे रहे हैं जिसकी आशंका जताई गई थी। लेकिन राज्य के लिए यह एक गलत परंपरा शुरु की जा रही है कि मुद्दों से जनता और राज्य का ध्यान भटकाने के लिए झूठ का पुलिंदा खोला जाए और उलझाकर रंगमंच के कलाकार की तरह नाटक का स्वांग किया जाए। झारखंड के एक अग्रणी समाचार पत्र में सबसे ज्यादा इस मामले को उछाला गया, मजदूर संगठनों के द्वारा बैठ की गई और सभी यूनियन एक साथ बैठकर एचईसी बचाओ मंच का गठन भी कर लिया। इस बीच कागजी घोड़े दौड़ते रहे और बयानों का पुलिंदा भी खुलता रहा। कभी कोई बयान देता रहा कि "आर पार की लड़ाई होगी "बिकने नहीं देंगे HEC", "झारखंड जीता सरकार हारी", "जान दे देंगे लेकिन एचईसी को बचाएंगे" सुनने में नारे तो बहुत अच्छे लगते हैं लेकिन भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस की भाषा बोलने वाले यह लोग क्या यह जानते हैं कि यह सारा मामला प्रॉक्सी यीशु था। कभी भी केंद्र सरकार ने या उसके मंत्री ने अधिकारिक तौर पर एचईसी को बंद कर रहे हैं या निजी करण करने संबंधित कोई आदेश पारित नहीं किया था। और इस गंभीर विषय को पता नहीं कौन वह लोग थे जो इतना बढ़ा चढ़ाकर प्रकाशित करवाएं कि लगा कि पिछले 1 हफ्ते से एचईसी का मामला बिकने के अंतिम कगार पर आ चुका है।

ऐसे गैर जिम्मेदाराना खबर से समाचार पत्र की गरिमा को धूमिल करते हैं बल्कि जनता से उनका भरोसा भी उठने लगता है और वह तलाश करते हैं कि खबर में सच्चाई है भी या नहीं। यह सही है कि एचईसी को बिकना नहीं चाहिए क्योंकि यह राज्य के लिए एक अमूल्य धरोहर है और एक पहचान भी है। झारखंड, देश और विदेश में अपने काम के बदले एचईसी ने अपना गौरव मान और अपना स्किल से लोहा मनवाया है। इसका मतलब यह नहीं हुआ कि इतने बड़े प्रतिष्ठान को राजनीति के अखाड़े में लाकर खेल खेला जाए। विगत दिनों जो कुछ भी हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण था चाहे इसके पीछे किसी की कोई मंशा रही हो, लेकिन ऐसे खबर को गैर जिम्मेदाराना, दुर्भाग्यपूर्ण और ध्यान भटकाने वाला खबर ही माना जाएगा। रांची के सांसद रामटहल चौधरी के बयान से यह साफ झलकता है कि मामला कुछ गड़बड़ है उन्होंने कहां है कि -"मैं जब दिल्ली में अनंत गीते से मिला था, तो उन्होंने कहा था कि आप एचईसी को बचाने के लिए आवाज उठाइए। वह 8-10 दिन में बताएंगे कि एचईसी को बचाने के लिए क्या किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा था कि अपने CM को कहें कि वह केंद्र पर दबाव बनाए कि कंपनी न बिके। निजीकरण ना हो।" चलिए जो भी हो एचईसी पर हो रहे नाटक का पटाक्षेप तो हुआ?

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