HEC बहाना, मकसद जनता का ध्यान भटकाना

मनोज कुमार सिंह
रांची के सांसद राम टहल चौधरी के एक बयान के बाद अचानक झारखंड की राजनीति में हो रहे भूचाल से ध्यान को भटकाने का प्रयास किया जा रहा है, भारी उद्योग मंत्री अनंत गीते ने रांची के सांसद से सामान्य मुलाकात पर एचईसी को बेचने के मंसूबा का मौखिक बयान किया है, उनका यह भी कहना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से भी ऐसे संकेत मिले हैं, लेकिन इन दोनों बातों का कोई प्रमाणिक दस्तावेज उन्होंने सांसद को नहीं दिया। मात्र इस बयान के बाद राज्य के कुछ स्थानीय समाचार पत्रों द्वारा इस मुद्दे को इस प्रकार प्रकाशित किया है जैसे एचईसी को बेचने का आदेश सरकार ने पारित कर दिया हो।

असल में विगत दिनों झारखंड की राजनीति में जो बवाल मचा हुआ है और लाख प्रयास के बाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। उसी मुद्दे से ध्यान भटकाने के एक प्रयास मात्र के रूप में इसे देखा जा सकता है। विदित हो कि सरकार और संगठन के लाख प्रयास के बावजूद नेतरहाट में कैबिनेट की बैठक में 2 कैबिनेट मंत्री और 13 विधायकों का अनुपस्थित होना एक तरह से सरकार के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। कहा जाए तो इस वक्त राज्य के सभी आवश्यक मुद्दे गौन हो चुके हैं, विपक्षी पार्टियों, सामाजिक संगठनों एवं भारतीय जनता पार्टी के विरोधी गुट का लगातार सरकार पर प्रहार चल रहा है। सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ है, राजनीति के रणनीतिकारों को यह समझ नहीं आ रहा है कि ऐसे नाजुक वक्त पर कौन सा रास्ता अख्तियार किया जाये। आगामी कुछ दिनों तक पार्टी के भीतर यही हालात बने रहे तो राज्य के विकास का कार्य भी बाधित होगा। राज्य की मुख्य सचिव, कुछ दागी अधिकारियों को बचाने का प्रयास सरकार को महंगा ना पड़ जाए। करीबी सूत्रों का यह भी कहना है कि झारखंड में भाजपा का यह काउंट डाउन है, क्योंकि कल नेतरहाट के मीटिंग में अधिकांश आदिवासी विधायकों की अनुपस्थिति इस ओर संकेत कर रही है कि नियोजन नीति और स्थानीय नीति को लेकर हो रही प्रतिक्रिया के चलते कहीं वह चुनाव ना हार जाए।

इस भय के चलते पार्टी के अधिकांश विधायकों की छटपटाहट बढ़ गई है और यही कारण है कि राजनीतिक विशेषज्ञ यह मानते हैं कि सरकार पर बने इस संकट और विधायकों की नाराजगी से ध्यान भटकाना जरूरी हो गया है और इसी रणनीति के तहत अचानक एचईसी बेचने वाला मुद्दा उठाकर बरगलाने का काम किया जा रहा है। और यदि मान लिया जाए कि सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय दोनों एचईसी को बेचना चाहते हैं तो यह कदम सरकार के लिए आत्मघाती और जनविरोधी माना जा सकता है, ऐसे में ध्यान तो नहीं भटकेगा लेकिन पार्टी अपने लिए लेकिन नई खाई खोद सकती है। आगामी दो-तीन दिन राज्य में राजनीतिक सरगर्मियां और बढ़ेंगी और उसका क्या परिणाम होगा यह कहना मुश्किल है। और यदि यह सही है कि एचईसी को बेचने का फैसला केंद्र सरकार करना चाहती है, तो इसे बचाने के लिए राज्य सरकार को तुरंत हरकत में आना चाहिए और राज्य की भावना से सरकार को अवगत कराना चाहिए। राजनीतिक जुमलेबाजी और समाचार पत्रों के माध्यम से केवल बयान देने से कुछ नहीं होने वाला है।

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