लेफ्टिस्ट बंगाल के बाद गुजरात बना राइट का गढ़

गुजरात विधानसभा में बीजेपी ने 99 सीटों पर कब्जा जमाकर विपक्ष को सोचने पर जरूर मजबूर कर दिया है. चुनाव की जीत का सेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिर बांधा गया. और इसमें कोई दो राय नहीं की नरेंद्र मोदी जितना गुजरात को समझते हैं उतना शायद ही कोई और समझता है. विपक्षी पार्टियों के कई रणनीतिकारों ने अपने-अपने तजुर्बे से बीजेपी के इस अभेद्य किले में सेंध लगाने की भरसक कोशिश की पर अंततः असफल हुए. हालांकि कांग्रेस भी पहले की अपेक्षा ज्यादा मजबूती से उभरकर सामने आई है. 22 साल बाद गुजरात में कांग्रेस सत्ता की दहलीज से थोड़ी दूर ठहर गई. जानकारों की मानें तो कांग्रेस कई रणनीतिक खामियां रहीं जिससे वह सत्ता पर काबिज होने में नाकामयाब रही। और एक तरह से देखें तो देश में गुजरात बीजेपी का अभेद्य दुर्ग बन चुका है.

1995 में गुजरात के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हराकर BJP ने अकेले सरकार बनाई थी. हालांकि राज्य में चिमनभाई पटेल के साथ बीजेपी गठबंधन की सरकार काफी पहले ही सत्ता में आ गया था, लेकिन ये टिक नहीं पाया. 2001 में नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया था. उसके बाद से अभी तक ये पांचवां चुनाव है जो मोदी के चेहरे पर लड़ा गया और बीजेपी को उसमें कामयाबी मिली. अगर पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु को देखें तो 1977 में उनके नेतृत्व में ही वाम मोर्चा सत्ता में काबिज हुआ था. 2000 में बुद्धदेव भट्टाचार्य का मुख्यमंत्री बनने तक वाम मोर्चे ने ज्योति बसु के चेहरे पर ही चुनाव लड़ा और जीता. इसे अगर यूं भी कहें कि जीवित रहने तक पश्चिम बंगाल में ज्योति का चेहरा ही वाम चेहरा था तो शायद गलत नहीं होगा. 2010 में उनका निधन हुआ और 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने वाम को बाहर उठा फेंका. 33 साल की सत्ता में बंगाल में जैसे ज्योति का कार्यकाल सबसे लंबा रहा और वो 'वाम अभेद्य दुर्ग' का चेहरा रहे. वैसे ही गुजरात के 22 साल की लगातार सत्ता में मोदी हैं. हालांकि लेफ्ट के कई नेताओं का आरोप है कि गुजरात को बीजेपी ने हिंदूत्व की प्रयोगशाला के तौर पर विकसित किया है. और बीजेपी की गुजरात की जीत उसी हिंदुत्व की जीत है, जिसे गाहे बगाहे बीजेपी नेता उभारते आये हैं.

जब 70 के दशक में ज्योति बसु वेस्ट बंगाल की सत्ता में काबिज हुए उन्होंने कुछ ऐसे काम किए जिनकी वजह से बंगाल वाम का गढ़ बना. ज्योति बसु ने जनहित से जुड़े लोकप्रिय फैसलों को प्रमुखता दी. राज्य में भूमि सुधार लागू किया. किसानों के लिए कल्याणकारी काम किए. बड़े पैमाने पर इसका असर हुआ और ग्रामीण इलाकों में वाम की पैठ मजबूत हुई. ठीक इसी तरह गुजरात में भी 'हिंदुत्व का चेहरा' करार दिए मोदी ने कई ऐसे फैसले किए जिसने व्यापक स्तर पर आम गुजरातियों को फायदा पहुंचाया. खासकर बिजली, सड़क और छोटे शहरों में औद्योगिकीकरण ने आम लोगों में उनकी घुसपैठ मजबूत की. उनके नेतृत्व में छठीं बार गुजरात में बीजेपी का चुनाव जीतना इस बात का सबूत है कि आज भी मोदी का भरोसेमंद चेहरा लोगों को बूथ तक खींचने में कामयाब होता है.

लंबे समय से बंगाल और गुजरात वाम और बीजेपी के लिए गढ़ रहे हैं. देखा जाय तो ज्योति के सत्ता से जाने के बाद वाम सरकार के खलाफ जिस तरह की जनभावना बनी कुछ-कुछ वैसी ही जनभावना मोदी के गुजरात छोड़ने के बाद भी नजर आई. ध्यान रहे कि पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव के आने के बाद वाम सरकार ने औद्योगिक निवेश को मंजूरी दी. सिंगूर (टाटा की नैनो प्लांट) और नंदीग्राम (केमिकल परियोजना) में इसका विरोध शुरू हुआ. लालगढ़ में भी माओवादियों के खिलाफ अर्धसैनिक बलों की कार्रवाई से जनाक्रोश भड़का. जब तक वाम सरकार जनभावना को समझ पाती काफी देर हो चुकी थी. 2006 में ममता बनर्जी ने इसे मुद्दा बनाया और 2011 आते-आते वाम सरकार को उखाड़ फेंका.

हालांकि मोदी के पीएम बनने के बाद गुजरात में औद्योगिक विरोध तो नहीं हुआ लेकिन कुछ ऐसे आंदोलन खड़े हुए जिससे लोगों की जनभावना भड़की. सबसे पहले पाटीदारों ने पिछड़ा आरक्षण की मांग की. हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पाटीदार अनामत आरक्षण समिति का गठन हुआ. पाटीदार बहुल 83 विधानसभा सीटों में इसका व्यापक असर नजर आया. कई दिनों तक विरोध प्रदर्शन और हिंसा की घटनाएं मिलीं. इसके बाद ऊना में गोरक्षकों द्वारा दलित उत्पीड़न का मामला सामने आया. जिग्नेश मेवानी ने इसे बीजेपी के खिलाफ गुजरात समेत पूरे देश में मजबूत आंदोलन के तौर पर खड़ा कर दिया. उन्होंने 'आजादी कूच' अभियान चलाया. लेकिन ऐसे व्यापक आंदोलनों के बावजूद बीजेपी को 2017 के विधानसभा चुनाव में वैसा नुकसान नहीं हुआ जैसा बंगाल में वाम मोर्चे ने झेला. इसकी वजह है.

दरअसल, गुजरात में जब बीजेपी और मोदी की खिलाफत शुरू हुई तो मोदी ने वैसा रवैया नहीं अपनाया जैसा कि बंगाल में वाम मोर्चे की सरकार ने किया. पाटीदार आंदोलन और ऊना काण्ड को देखें तो मोदी ने राजनीतिक सूझ का परिचय दिया. जब पाटीदार आरक्षण के लिए भड़क कर सड़क पर उतर आए मोदी ने जल्दबाजी नहीं दिखाई और आंदोलन को बलपूर्वक कुचलने की कोशिश नहीं की. पाटीदार भड़के नहीं इसके लिए आंदोलन चलने दिया गया और पार्टी के पाटीदार नेताओं को आगे कर माहौल नर्म बनाने की कोशिश हुई. आनंदीबेन को तुरंत हटाया भी नहीं गया. मोदी के निर्देश पर धीरे-धीरे ठंडे दिमाग से पाटीदारों के मसले पर बीजेपी ने काम किया. इसका असर यह हुआ कि काफी हद तक हार्दिक का आंदोलन उग्र नहीं हो पाई.

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