फ्लड पॉलिटिक्स बंद करिए सरकार

सियासत और सरकारों की संवेदना सचमुच मर गई है। तभी तो भीषण बाढ़ में मर और डूब रहे बिहार के लोगों को राहत का मरहम देने की बजाय प्रदेश में फ्लड पॉलिटिक्स खेला जा रहा है। पिछले एक सप्ताह से मिथिलांचल, सीमांचल और कोशी का इलाका बाढ़ से तबाह है। आम लोग नारकीय स्थिति झेल रहे हैं। 5 दर्जन से अधिक लोगों की मौत का आधिकारिक आंकड़ा आ चुका है। हजारों घर ढह-बह गए। हजारों मवेशी दह गए। खेतों में लगी फसल देखते ही देखते ख़त्म हो गई। नाउम्मीदी की चादर पूरे उत्तरी बिहार पर पसर गई। सरकार से ऐसे मौके पर उम्मीद होती है कि वो विनाश की इस घड़ी में प्रभावितों के बीच राहत पहुंचाये। लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है। बाढ़- बाढ़ खेल रहे हैं बिहार के पॉलिटिशियन। हवाई सर्वेक्षण कर चुके हैं नीतीश कुमार। राहत के झूठे दावे कर रहे अधिकारी। सभी बयानबहादुर लम्बे चौड़े भाषण दे रहे हैं।

आप कल्पना करिए। एक भी शख्स मारा जाता है किसी की गलती से तो दोषी पर कार्रवाई होती है। लेकिन इतने लोगों की मौत हो गई, इतनी बर्बादी हुई, पर जल संसाधन विभाग के अधिकारी और मंत्री इत्मिनान हैं। हर नदी के आस- पास तथा बांधों पर जल संसाधन विभाग के कर्मी निगरानी करते हैं। जहां कोई नदी खतरे का निशान पार करती है तो तुरंत बचाव के उपाय किये जाते हैं। लेकिन भ्रष्टाचार के दीमक ने पूरे विभाग को ही खोखला कर दिया है। जिला प्रशासन के कर्मी हर जगह हैं, ठेकेदारों की लम्बी फ़ौज है जो कागजों पर मरम्मत के नकली फूल उगाते रहते हैं। इन लोगों पर सामूहिक हत्या का मुकदमा होना चाहिए।

विभाग के मंत्री पटना में आराम से हैं। प्रभारी मंत्री जिलों में सर्किट हॉउस के एसी कमरे में मुर्गा तोड़ रहे हैं। अधिकारी बेलगाम हैं। ऐसे में होगा क्या। क्या लालकिले के प्राचीर से प्रधान मंत्री के दिए भाषण से बिहार के बाढ़ पीड़ितों को राहत मिल पायेगी। क्या नीतीश कुमार पूरी व्यथा कथा सुनेंगे या केवल पॉलिटिक्स ही करते रहेंगे।

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