स्थानीय नीति, जमीन अधिग्रहण पर स्टैंड क्लियर करे सरकारः आजसू

आजसू पार्टी के प्रधान महासचिव सह विधायक रामचंद्र सहिस ने कहा है कि स्थानीय नीति में संशोधन और भूमि अधिग्रहण के लेकर आजसू पार्टी द्वारा उठाये गये सवालों को टालने के बजाय सरकार शीघ्र जवाब दे। उन्होंने कहा है कि स्थानीय नीति को लेकर हाल ही में पार्टी के केंद्रीय अध़्यक्ष सुदेश महतो ने मुख्यमंत्री के पत्र लिख कर साफ किया था कि सरकार द्वारा तय नीति झारखंडी भावना के खिलाफ है और इससे आदिवासी- मूलवासी युवा वर्ग में भारी नाराजगी है।
पार्टी का स्पष्ट मत है कि अंतिम सर्वे रेकार्ड ऑफ राइटस में जिनके पूर्वजों का नाम होगा, तृतीय, चतुर्थ वर्गीय नियुक्तियों में उन्हें स्थानीय माना जाय तथा शत-प्रतिशत नियुक्ति उनकी ही की जाए। इसके बाद भी सरकार इस मसले पर स्पष्ट फैसले लेने के बजाय अन्य लोगों के लिए 30 साल से झारखंड में निवास करने और मैट्रिक के प्रमाण पत्र को मानक बनाया गया है, जो गलत है। इसलिए सरकार स्पष्ट करे कि स्थानीय नीति में वह संशोधन चाहती है या नहीं । तृतीय और चतुर्थ वर्ग़ीय नियुक्तियों में भी पूरे देश से लोगों के आने का मार्ग खोल दिया गया है। टीचर तथा दरोग़ा नियुक्ति में आधे लोग बिहार, यूपी तथा बंगाल से आ जाएंगे। इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है? अभी भी समय है, रिज़ल्ट आना बाक़ी है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा की राज्य से बाहर के लोग तृतीय और चतुर्थ वर्ग की नौकरियों में ना आ पाएं।
आजसू विधायक ने कहा है कि घटक दल होने के नाते तीन सालों से पार्टी सरकार को इस मामले पर आगाह कराती रही है , लेकिन हमारी बातों की अनदेखी होती रही है। जबकि सरकार को इस मसले पर जन संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ा है। जनता के बीच सरकार की दोषपूर्ण नीति पर जवाब देने में आजसू को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। भाजपा के जन-प्रतिनिधियों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता होगा। बीजेपी आलाकमान अपने एमएलए और एमपी से भी मंतव्य ले सकती है । सरकार को जनप्रतिनिधियों की बातों को संज्ञान में लेना चाहिए।
मुख्यमंत्री और बीजेपी दोनों स्पष्ट करे कि घटक दल द्वारा जनहित में जो सवाल खड़े किए जाते रहे हैं उसे किन परिस्थतियों में नजर अंदाज किया जाता रहा है। विधायक ने कहा है कि सीएनटी-एसपीटी के मुद्दे पर भी सरकार और खासकर मुख्यमंत्री की जिद के कारण झारखंड में एनडीए को विरोध का सामना करना पड़ा। जबकि आजसू ने लगातार आगाह कराया है कि गलत नीति से झारखंड में जनाक्रोश बढ़ रहा है। आख़िरकार सरकार बैकफुट पर आयी। वहीं विपक्ष इसे भुनाने में सफल हो रहा है कि एनडीए सरकार सीएनटी, एसपीटी एक्ट में संशोधन करना चाहती है। जबकि ख़ुद जेएमएम ने 2010 और 2014 में इसमें संशोधन का प्रयास किया था।
इसके साथ ही भूमि अधिग्रहण को लेकर आदिवासी- मूलवासी जिस तरह से उद्वेलित हैं उस पर सरकार क्या कदम उठाने जा रही है। क्योंकि विपक्ष लोगों को भ्रमित कर बरगलाने में सफल हो जाती है। भूमि अधिग्रहण एक्ट, कांग्रेस ने बनाया लेकिन आज ठीकरा एनडीए पर फोड़ने में विपक्ष लगा हुआ है ।
भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में अंग्रेजों के समय बना था जिसमें राजीव गांधी सरकार ने 1984 में संशोधन किया। इस संशोधन के तहत एक्ट की धारा 4, 6, 11 व 12 के अधीन सरकार किसी भी रैयती जमीन का सार्वजनिक कार्य के लिए अधिग्रहण कर सकती है। सरकार के चाहने पर रैयत भूमि देने से मना नहीं कर सकते।
इसी कानून की धारा 22(2) में साफ कहा गया है कि भू-अधिग्रहण के बाद रैयत यदि पैसा नहीं लेते हैं तो अधिग्रहण की वैधता पर सवाल नहीं उठा सकता। कोई पैसा ले या नहीं सरकार द्वारा ट्रेजरी में पैसा जमा करा देने के बाद उसे पैसा दे दिया गया माना जाता है।

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