बर्बाद हो रहा पिछड़े नौजवानों का भविष्य

मनोज कुमार सिंह
माननीय मुख्यमंत्री द्वारा जजों की नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में यह बताया गया कि वर्तमान सरकार ने अब तक 69,000 से अधिक अस्थाई पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया शुरू कर दिया है। इनमें 29,907 पदों पर नियुक्तियां की जा चुकी है। साथ ही विभिन्न विभागों में कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर 32,000 पदों की नियुक्तियां की गई हैं। यदि सरकार के इस वक्तव्य को वर्तमान आरक्षण पद्धति के आधार पर मूल्यांकन किया जाए तो झारखंड के हजारों नौजवानों का भविष्य बर्बाद हो चुका है औऱ आगे भी यदि आरक्षण व्यवस्था पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो झारखंड भारत का पहला ऐसा राज्य होगा जहां के आधी आबादी के नौजवान अपने अधिकारों से वंचित हो जाएंगें।

आज एक जनसभा में माननीय मुख्यमंत्री जी ने यह स्वीकार किया है कि पिछड़ों को जनसंख्या के आधार पर आरक्षण का लाभ मिलेगा, उन्होंने यह भी कहा कि जिन जिलों की वैकेंसी में पिछड़ों का आरक्षण ०% है वहां सरकार जनसंख्या के आधार पर उन्हें आरक्षण दिलाने की दिशा में काम कर रही है लेकिन इस गंभीर विषय पर सरकार का कोई भी प्रयास अब तक नहीं किया गया है! पिछड़ा वर्ग आयोग की अनुशंसा के बावजूद भी सरकार ने आरक्षण रोस्टर को सही नहीं किया है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अन्य राज्यों में जहां पिछड़ी जाति को 27% आरक्षण का प्रावधान है वहीं झारखंड में मात्र 14% पिछड़ों को आरक्षण दिया जा रहा है, वर्टिकल आरक्षण पद्धति के तहत पांचवी अनुसूची में आने वाले 7 जिलों में पिछड़ों का आरक्षण जहां 0% है वहीं 7 जिलों में 2 से लेकर 8% तक आरक्षण का प्रावधान है।

सरकार नियुक्तियों का आंकड़ा देकर अपना पीठ तो थपथपा सकती है लेकिन उन नौजवानों के भविष्य का क्या होगा जो अपने अधिकार से वंचित रह गए हैं। इस गंभीर मुद्दे पर ना तो सरकार गंभीर है और ना ही विपक्ष के लोग इस मुद्दे को गंभीरता से उठाना चाहते हैं। कुछ सामाजिक संगठन अलग-अलग टुकड़ों में बटकर दबी जुबान से इस सच्चाई को स्वीकार तो करते हैं लेकिन अपनी लड़ाई जब लड़ने की बात आती है तो उन्हें रास्ता नहीं सूझता है।झारखंड के राजनीतिक दलों द्वारा कभी भी अपने मुख्य एजेंडा का हिस्सा नहीं बनाया गया जिससे पिछड़ी जाति को उनका हक मिल सके लेकिन अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि समाज के सुगबुगाहट को सरकार और राजनीतिक दलों ने भाप लिया है कि यदि इस मुद्दे को नहीं सुलझाया गया तो बड़ी राजनीतिक हानि होगी। वैसे भी झारखंड में इस ज्वलंत मुद्दे को अब दबाना भारी पड़ सकता है।

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