गरीबों का गठबंधन है राजद: फरजान

युवा राजद के महासचिव फरजान अहमद कहते हैं कि भाजपा और जदयू गलत फहमी में हैं। इन्हें लग रहा है कि लालू प्रसाद जेल में होंगे तो राजद खत्म हो जायेगा। लालू से मिलने रिम्स पहुंचे फरजान कहते हैं कि लालू प्रसाद ने राजद को केवल दल के रूप में खड़ा नहीं किया, उन्होंने बिहार के करोड़ों गरीब गुरबों, दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों का गठबंधन बनाया। यह गठबंधन चट्टान की तरह लालू जी के विचारों के साथ खड़ा है। लालू जी जेल में हैं तो इस गठबंधन की नुमाइंदगी तेजस्वी जी कर रहे हैं। तेजस्वी जी इस गठबंधन के चेहरा हैं। उनमें बिहार को लड़ाका लालू जी दिखते हैं। इस उपचुनाव में आपने देखा ना कि कैसे हर दल और जाति के युवाओं ने तेजस्वी जी का समर्थन किया। फरजान कहते हैं कि अस्पताल में भी लालू जी अपने बारे में नहीं सोच रहे थे, वो बिहार के करोड़ों गरीबों की ही चिंता कर रहे थे।

फरजान कहते हैं कि ऐसे में लालू जी की राजद अब बिहार के अवाम की आईना है। फरजान लालू प्रसाद को बाजीगर कहते हैं। हार कर जो जीते, वही तो बाजीगर होता है ना। राजद का यह उत्साही युवा नेता कहता है कि तमाम अंधेरे से निकलकर उनका नेता आएगा, लालूजी जेल से निकलेंगे और तमाम राजनीतिक षड्यंत्र विफल होंगे। इन्हें उम्मीद है कि अगले चुनाव से पहले लालू प्रसाद बिहार के चुनावी मैदान में होंगे और साथ में होगा बिहार का अपार जन समर्थन। फरजान जैसे लोगों की प्रतिबद्धता अपनी जगह है लेकिन क्या सचमुच ऐसा हो पायेगा! यह यक्ष प्रश्न है। लालू प्रसाद जितने दिन भी जेल में रहेंगे, विपक्ष को उनकी कमी महसूस होगी। उत्तरप्रदेश में सपा और बसपा गठबंधन की बात सबसे पहले लालू ने ही शुरू की थी। विधानसभा चुनाव के वक्त उन्होंने मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव से लेकर मायावती तक को समझाने की कोशिश की थी। उन्होंने हवा का मिजाज भांप लिया था। जरा सोचिये! जिस तरह उपचुनाव में सपा और बसपा ने साथ आकर भाजपा के तमाम समीकरण पलट दिए, अगर विधानसभा चुनावों में इन दलों ने लालू की बात मान ली होती तो आज उत्तरप्रदेश की सियासी तस्वीर बदली हुई होती।

लालू ने इसी बदलाव को बिहार में भी समझ लिया था, तभी तो भाजपा के अजेय रथ का मुकाबला करने अपने चिर प्रतिद्वंदी नीतीश कुमार से भी हाथ मिलाया था उन्होंने। अभी लालू की कमी राष्ट्रीय फलक पर सबको खल रही है। राहुल गांधी भले ही कांग्रेस के अध्यक्ष हैं लेकिन उनकी छतरी के अंदर आने में अन्य दलों को एक हिचकिचाहट है। अभी अगर लालू होते तो वे हंसकर, मनाकर सबको भाजपा विरोधी मंच पर जुटा चुके होते।

लालू की यही स्वीकार्यता उन्हें देश के बड़े नेताओं में शुमार करती है। दरअसल धुन के धनी लालू ने कभी भी सत्ता के लिए अपनी राह नहीं बदली। शुरू से जो मंडल की मशाल थामी उसमें कमंडल के लिए कोई गुंजाईश ही नहीं छोड़ी। जेपी आन्दोलन में जनसंघ का साथ था, शायद नानाजी देशमुख के बाद कभी आरएसएस या भाजपा के प्रति अपने राजनीतिक नफरत को उन्होंने नहीं छुपाया। हमेशा हिंदूवादी पलटन के खिलाफ लोहा लेते रहे। इस बीच लालू के कई साथी कमलवादी हो गए, लालू ने ऐसे लोगों से हमेशा लोहा लिया। छठ, कुर्ताफाड़ होली, रामनवमी, जन्माष्टमी जैसे पर्व डूबकर मनानेवाले लालू को सॉफ्ट और हार्ड हिंदुत्व की अलग-अलग परिभाषा गढ़ने की जरुरत कभी महसूस नहीं हुई। वो स्वाभाविक तौर पर थाबे माई के मंदिर जाते रहे, इसका प्रचार नहीं किया, लेकिन लालकृष्ण आडवानी को समस्तीपुर में गिरफ्तार कर अल्पसंख्यकों का ऐसा दिल जीता कि बिहार की माइनॉरिटी ने हमेशा उनपर भरोसा किया और अपना रहनुमा समझा।

इस बार राज्यसभा में मुसलमान और ब्राह्मण को टिकट देकर राजद ने एक बार फिर सबको चौंकाया। क्या यह सवर्णों को भी साथ जोड़ने की लालू की नयी राजनीति है! क्या लालू तेजस्वी को सामने रखकर राजद की और समावेशी तथा उदार छवि गढ़ना चाहते हैं ! क्या है लालू राजनीति का नया लोकराग ! राजद के वरिष्ठ नेता इसमें कोई नयी बात नहीं देखते। वो कहते हैं कि लालू की राजनीति हमेशा से ऐसी ही समावेशी थी , तो फिर भूरा बाल साफ करो जैसे नारे कैसे लगाये गए! राजद के नेता इसे विपक्ष की ही करतूत मानते हैं।

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