राजनीति में किसानों के खड़े होने का वक्त

बिहार की राजनीति करवट बदल रही है. तमाशा और हंगामा के बीच नए सियासी किस्से लिखे जा रहे हैं. इसी बीच किसानों के सवाल अहमियत पाने लगे हैं. अन्ना के बिहार दौरे की वजह से अचानक किसान पॉलिटिक्स के सेंटर स्टेज पर आ गए हैं. अब तक किसानों को मजबूरी का सियासी हथियार मानने वाले राजनीतिक दलों की पेशानी पर बल आ रहा है. आखिर इतने दिनों तक बिहार की सियासत किसानों के सवाल पर चुप क्यों थी. क्यों उन्होंने यह मान लिया था कि किसान तो यूं ही जीने के लिए अभिशप्त हैं. राजनेताओं ने यह क्यों मान लिया था कि संगठित होने की वजह से किसानों के सवाल यूं ही टाले जाते रहेंगे.

आखिर अन्ना ने ही बिहार के वृद्धि किसानों और खेतिहर मजदूरों का सवाल क्यों उठाया! किसानों का वोट लेनेवाले राजनीतिक दल के नेताओं ने पहले यह सवाल क्यों नहीं उठाया था! किसानों की हालत बिहार के नेताओं से छिपी नहीं है. दाने दाने को मोहताज बिहार के लाखों सीमांत किसान किसी इलाके में बाढ़ तो किसी इलाके में सुखाड़ की वजह से परेशान रहते हैं. दर्जनों नहर परियोजनाएं बंद बंद हैं.

2 एकड़ की खेती करने वाले सीमांत किसान इस हाल में नहीं रहते कि समय पर अपने बच्चे की फीस भर पाएं या उन्हें अच्छे कपड़े दिला पाएं. जब वह बूढ़े हो जाते हैं तो उस 2 एकड़ पर खेती करने वाले की संख्या 4 हो जाती है. इस छिपी हुई बेरोजगारी की वजह से वृद्ध किसान की हालत दिनों दिन जर्जर होती जाती है. ऐसे में राज्य सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि वह अन्नदाताओं का सम्मान करे और उन्हें उचित पेंशन दें. अन्ना ने यह सवाल उठाया है. उम्मीद है कि नीतीश कुमार संवेदनशीलता दिखाते हुए यह न्यायोचित मांग मानेंगे और बिहार के लाखों किसान भाइयों को पेंशन देने का ऐलान करेंगे.

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