मुख्यमंत्री जी ! कुछ करिए…भीड़ का हिस्सा मत बनिए

(मनोज कुमार सिंह) भ्रष्टाचार के मुद्दे पर माननीय मुख्यमंत्री के प्रयास डगमगाने लगे हैं. भय-भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ी होने वाली भारतीय जनता पार्टी के सरवरा राज्य के मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास कुछ नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़खड़ाने लगे हैं. उनकी क्या विवशता है! यह तो वही जानते होंगे लेकिन राज्य की जनता यह सोचने लगी कि दाल में कहीं काला है. दबी जुबान से तो लोग यह भी कहने लगे हैं कि कहीं दोहरे चरित्र के कारण पूरी दाल ही तो नहीं काली हो चुकी है. लोकतंत्र में सरकारें आती हैं, जाती हैं लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं है कि सदन में ऐसे मापदंड तय करें जो भविष्य में राज्य की राजनीति एवं नेताओं को गलत दिशा में मार्गदर्शित करें.

माननीय मुख्यमंत्री जी लोग तो सवाल पूछेंगे ही. विगत चुनाव में पूरे देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई छिड़ने के तेवर भारतीय जनता पार्टी को कहीं महंगा न पड़ जाए. झारखंड में तो स्थिति और भी हास्यास्पद लगने लगी है, राज्य के एक वरिष्ठ मंत्री जो सदन के संसदीय कार्य मंत्री भी हैं, एक तरफ सरकार के क्रियाकलाप को जनमानस में उठाते हैं, वही दूसरी तरफ सदन में सरकार की तरफ से कुछ और बात बोलते हैं. लोग इस केमिस्ट्री को समझना चाहते हैं.

माननीय मुख्यमंत्री जी आप के पास मौका भी है, सदन में बहुमत भी है. यह साबित करने के लिए सरकार दिग्भ्रमित नहीं है, भ्रष्टाचारियों के पक्ष में नहीं खड़ी है. अगर आप चल सके तो चलें अन्यथा इतिहास आपको माफ नहीं करेगा यद्यपि नौकरशाहों के विरुद्ध विपक्ष के द्वारा उठाए जाने वाले सवाल भी सवालों के घेरे में है. इसलिए कहा गया है कि लोकतंत्र में किसी भी समय जनप्रतिनिधि को वैसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए जो इतिहास का हिस्सा बन जाए. वह तो दिख रहा है कि विगत सरकारों ने जिन अपराधिक चरित्र और विवादास्पद नौकरशाहों को इस राज्य का सरताज बनाया, वही आज सवाल खड़े कर रहे हैं, नहीं लगता है कि उनके उनके पांव अंगद की तरह मजबूत नहीं दिख रहे है.

भाई जनता है सब देख रही है. सब सुन रही है और आपके मुखोटे के पीछे के उस रहस्य को परखने की कोशिश भी कर रही है. नाटक मनोरंजन के लिए अच्छा तो हो सकता है, लेकिन ऐतिहासिक नहीं, दबी जुबान से पर्दे के पीछे संघ और नैतिकता की बात करने वाले उन लोगों को सामने आकर कोई सम्मानजनक मार्ग प्रशस्त करना चाहिए जो समय का तकाजा है अन्यथा शुचिता और सिद्धांत की बात करने का दावा खोखला साबित हो सकता है.

दूसरे दलों से श्रेष्ठ दिखने का सिर्फ दम भरने से कुछ नहीं होगा. उसे आचरण में उतारना ही पड़ेगा. माननीय मुख्यमंत्री जी कृपया इस मौके को हाथ से ना जाने दें. आगे बढ़कर इस राज्य की जनता को यह दिखाएं कि मेरे कुर्सी पर रहते लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ेगा. वैसे आपके विगत दिनों के क्रियाकलाप से ऐसा लगता तो नहीं है, लेकिन इतिहास हर उस व्यक्ति को मौका देता है कि वह अपना नाम अगली पंक्ति में लिखवा सकें. यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है के उस मौके का फायदा उठाता है या फिर भीड़ तंत्र का हिस्सा बनकर अलग हो जाता है.

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