क्या ज्यां द्रेज़ हैं झारखंड सरकार का अगला निशाना !

सिमडेगा में जो हुआ, उसके बारे में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने महीनों पहले आगाह किया था | कुछ महीने पहले भोजन का अधिकार पर बात करते हुए उन्होंने कहा था कि जिनको आज अनाज की सबसे ज्यादा जरुरत है, वे ही अनाज से वंचित हो रहे हैं. उनको अनाज प्राप्त करने में कई तरह की परेशानी आ रही है. यह चिंता का विषय है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि किसी को भी राशन से वंचित न किया जाए.

काश ! झारखंड के हुक्मरानों ने उस वक़्त उनकी बात सुनी होती तो सिमडेगा वाली घटना नहीं हुई होती | आज झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन करते हुए कहा है कि किसी का भी राशन तकनीकी आधार पर नहीं रोका जाएगा | ऐसे में ज्यां द्रेज़ से पहले से चिढ़ी राज्य सरकार क्या इस प्रसिद्ध अर्थशास्त्री को अगला टारगेट बनाने जा रही है ! ऐसे ही संकेत राज्य सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों ने दिए हैं |

ज्यां द्रेज ने दुमका में कई आदिवासी गांव घूमने के बाद कहा था कि जब वे लोग आदिवासी बस्ती अमलागढ़ी पहुंचे, तो छह महिलाओं ने उन्हें बताया कि अंगूठा का निशान मैच न करने की वजह से कितनी तकलीफ हुई. इनमें से दो को तो अनाज से ही वंचित रह जाना पड़ा. सरकारी बेवसाइट के आंकड़े का हवाला देते हुए उन्होंने कहा था कि अप्रैल महीने में दुमका जिले में ही महज 54 प्रतिशत लोगों तक ही अनाज पहुंच पाया. तब उन्होंने राज्य सरकार से आग्रह किया था कि जो खामियां पोस से राशन वितरण में दिखी है, उसे संवेदनशीलता के साथ दूर किया जाय तथा सभी को अनाज की उपलब्धता सुनिश्चित हो, ऐसा प्रयास किया जाना चाहिए.

नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन के आग्रह पर तकरीबन 35 वर्ष पहले भारत आये ज्यां द्रेज़ ने अमर्त्य सेन के साथ पावर्टी एंड फेमिन लिखी थी | ज्यां द्रेज़ ने कई किताबें लिखी हैं जो वैश्विक स्तर पर चर्चित हुई हैं | इनके चार सह लेखकों को नोबेल पुरस्कार मिल चूका है | इतने प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री को झारखंड के कृषि मंत्री ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ना केवल अपमानित किया बल्कि मंत्री के गुंडों ने इन्हें मंच से भी उतार दिया | राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में मंत्री तथा राज्य सरकार की थू-थू हुई थी |

भोजन के अधिकार एवं अन्य कई मुद्दों पर आधारित जन कार्यक्रमों से जुड़े अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ से आखिर राज्य सरकार इतनी चिढती क्यों है | राज्य सरकार का धर्म है कि जनहित में स्वस्थ आलोचना सुने और उसके निराकरण की कोशिश करे | अपनी सारी सुविधाएं छोड़कर आदिवासी बहुल गांवों में घूम-घूम कर अपनी जिन्दगी खपाने वाले ज्यां द्रेज़ को सम्मान देने की बजाय राज्य सरकार लगातार उनके बारे में निंदन या उत्पीडन की कार्रवाई कर रही है | क्या राजनीतिक विरोध सुनने को भी तैयार नहीं है सरकार | क्या झारखंड में लोकतंत्र की बेमानी बातें कही जा रही हैं |

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