बिहार में जात न पूछो वोटर की

बिहार में बिना जाति के राजनीति न शुरू होती है ना ही ख़त्म, यह कहते हुए पूर्णिया के फागू मंडल के चेहरे पर एक गर्वितमुस्कान है। यही मुस्कान दशकों से बिहारी राजनीति का सारा समीकरण तय करती है। विकास की जितनी बड़ी-बड़ी बातें हर हुक्मरान करता है वो चुनाव आते-आते कुर्मी, यादव, मुसलमान, महादलित या सवर्ण बन ही जाता है, क्योंकि सबको पता है वोट का रास्ता जात की पगडंडी से होकर ही गुजरता है।
जाति की यही युगलबंदी कभी मुसलमान और यादव के माय समीकरण के चलते लालू को 15 सालों तक पाटलिपुत्र की तख़्त पर बिठाये रखती है तो बैकवर्ड, महादलित और अकलियत के साथ नीतीश कुमार को 10 सालों का राजसिंहासन सौंप देती है। इससे पहले कांग्रेस राज में सवर्ण, दलित और मुसलमान का ऐसा कॉम्बिनेशन था, जिसने हमेशा कांग्रेस को अभेद्य बनाये रखा। पिछले विधानसभा चुनाव में जब भाजपा ने मोदी लहर के जरिये सवर्ण और ओबीसी के एक बड़े हिस्से का समीकरण बनाकर लालू और नीतीश दोनों को थ्रेट किया तो विकास की बात करनेवाले नीतीश कुमार यादव और मुसलमान वोटों के बाज़ीगर लालू के साथ हो गए और मंडलवादी लालू अति पिछड़ा तथा महादलित वोटों के लिए उस नीतीश के साथ हो गए, जिसे दिन-रात गालियाँ देते नहीं थकते थे। दोनों के अस्तित्व का सवाल था, इसलिए इन्होने जातीय जुगलबंदी कर ली।

बात अगले या पिछले चुनाव की ही नहीं है। बिहार की राजनीति का ककहरा भी कास्ट से शुरू होता है। यह बिहारी समाज के रोटी-बेटी फलसफे से जुड़ा हुआ है। हर जाति के पास अपना खोल है, तर्क का अपना आवरण है। आपस में चाहे कितने ही झगडे क्यों न हों लेकिन चुनाव इस उम्मीद में जातीय वोटरों को एकजुट कर देती है कि दूसरा ही क्यों अपना ही क्यों नहीं।

बहुत साल पहले बिहार के वरिष्ठ पत्रकार विकास कुमार झा ने अथ भूमिहार कथा लिखी थी। कई प्रसंग उसके बाद सामने आये। लेकिन चर्चित समाजशास्त्री डॉ एस नारायण कहते हैं कि बिहार का जातीय मिथक कई समाजशास्त्रीय पक्षों की और संकेत करता है। इसपर उनके कई शोध भी हैं, जिसपर विस्तार से आगे चर्चा होगी।

कुल मिलाकर जातीय समीकरणों की विवेचना यह समझने में हमारी मदद करेगी की बिहार की राजनीति क्यों जातीय जकडन से कभी मुक्त नहीं हो पाई। फिर इसके अन्तेर्विरोध भी हैं, जैसे राजपूत और भूमिहार क्यों एक दूसरे के विरोधी हैं। यादव और कुर्मी असहज क्यों हो जाते हैं साथ-साथ। पासवान दलित जमात में अलग-थलग क्यों रहता है! दलित आज भी बिहार के कई इलाकों में यादवों की बजाय सवर्ण के ज्यादा करीब है। ऐसे कई अन्तर्विरोध हैं, जिसके जरिये आपको बिहार की राजनीति का सच समझने में मदद मिलेगी।
बिहार के जानेमाने समाजशास्त्री, राजनीतिशास्त्री और पत्रकार कई दशकों के अपने अनुभवों के जरिये राजनीति की जाति कथा कहेंगे। कई कड़ियों में बात होगी। रोचक होगा सियासत का यह स्याह लेकिन यथार्थ पक्ष।

अगर आपके पास भी हो जातीय राजनीति की कोई रोचक कथा तो हमें लिखें....
हमारा पता है- editor.ranchi@gmail.com

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