नाराज़ किसानों के लिए डॉक्टर रघुवर की बजट थेरेपी

रघुवर सरकार का 2018-2019 का बजट क्या सचमुच सरकार की इस क्षेत्र के प्रति चिंता है या जमीन से बेदखल हो रहे ग्रामीणों और किसानों की नाराजगी को कम करने की यह रस्मी चतुराई है! विपक्ष और सरकार भले ही अपने अपने सियासी अजेंडे पर अलग-अलग तरीके से काम करते हों, लेकिन बजट के जरिये सरकार की तात्कालिक मंशा का खुलासा तो हो ही जाता है.

पहले विपक्ष के माइंडसेट को समझते हैं. विपक्ष लगातार पुलिस की गोलीबारी में मारे गए किसानों और जमीन से बेदखल हो रहे ग्रामीणों का सवाल उठाता रहा है. किसानों की जमीन बड़े व्यापारिक घरानों को देने का सवाल हमेशा प्रमुखता से उठा है. ऐसे सवालों की वज़ह से बडकागांव की विधायक निर्मला देवी और पोडैयाहाट के विधायक प्रदीप यादव जेल तक जा चुके हैं. ऐसे में हमलावर विपक्ष सरकार के बजट को किसानों के जख्म को भरने की चतुराई बता रहा है.

अब सरकार की सोच समझिये...अपने तीन साल शहरों के विकास में जुटी सरकार ने चुनाव से एक साल पहले यह समझा कि झारखण्ड के गांव को विकसित करने की जरुरत है. झारखण्ड की राजनीति का थोक वोट गांव और खेतों से आता है. जहां अमूमन किसी भी राज्य सरकार के प्रति गुस्सा ही होता है. क्योंकि कोई भी सरकार शहर की बिजली, पानी और चमकते रोड की चिंता में ही अमूमन डूबी होती है. गांव प्राथमिकता से कटता जाता है. वहां ना घरों में लटकते बल्ब रोशन होते हैं, ना बिचौलिए योजनाओं का फायदा ग्रामीणों तक पहुँचने देते हैं.

रघुवर सरकार ने अपने दम पर ताकतवर हो रहे मेधा दूध को और मजबूत करने की घोषणा की है. खेतों में ट्रांसफर्मर लगाने की बात की है, कोल्ड रूम बनाने की बात की है. मारे जाने पर किसानों और मजदूरों को 4-4 लाख देने की घोषणा की है. ऐसे तमाम कदम अच्छे हैं. कई अर्थशास्त्री कहते हैं कि इन कदमों से गांववालों की आमदनी बढ़ेगी.

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