क्या आप त्रिवेणी संघ और एस फोर को भूल गए!

अगर आप बिहार की राजनीति में रूचि रखते हैं तो ना आप पिछड़ा राजनीति को आकार देने वाले त्रिवेणी को भूले होंगे और ना ही अगड़ी राजनीति में नया उफान लाने वाले एस फोर को. फिलहाल बिहार की सियासत ने इन दोनों ही थिंक टैंक समूह को भूला दिया हो लेकिन इतना तो तय है कि बिहार की राजनीति अभी ऐसे मोड़ पर है, जहां से आगे का रास्ता बदलाव के बीहड़ों से गुजरेगा और तब ये दोनों ही विचार समूह याद आयेंगे.

पहले बात त्रिवेणी की...

65-70 के समय त्रिवेणी ग्रुप बना था. कुर्मी नेता गुरु सहाय लाल, यादव नेता अमीर गुरु और कुशवाहा नेता जगदेव प्रसाद की तिकड़ी इस समूह को लीड करती थी. तब कांग्रेस का दबदबा था. ऐसे में जातीय गणित के हिसाब से राजनीतिक भागीदारी का सवाल त्रिवेणी ने आक्रामक अंदाज़ में उठाया. हालांकि तब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री के बी सहाय ने त्रिवेणी को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभायी. वहीं से बिहार में पिछड़ा राजनीति का यू टर्न हुआ. लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और उपेन्द्र कुशवाहा सरीखे नेता आज अगर सत्ता में भागीदारी कर रहे हैं तो उसके पीछे त्रिवेणी थिंक टेंक की सबसे असरदार भूमिका रही लेकिन ये नेता अपने मेंटोर्स को कभी याद भी नहीं करते. जगदेव बाबू को तो हर साल रस्मी तौर पर याद किया भी जाता है लेकिन कृतघ्नता की पराकाष्ठा देखिये, पिछड़ा ब्रिगेड के कद्दावर नेताओं को शायद गुरु सहाय लाल और अमीर गुरु का नाम भी याद नहीं.

अब बात एस फोर की...

ऐसे ही राजनीति में हासिये पर धकेल दिए गए बिहार के 14 फीसदी अगड़ी जातियों को सम्मान दिलाने के मकसद से शुरू हुआ एस फोर (शोषित सवर्ण संघर्ष समिति) इन जातियों की जड़ता दूर करने में काफी सफल रहा. संजय वर्मा, रामबिहारी सिंह, चन्द्रभूषण राय और शंकर आज़ाद एस फोर के केंद्र में थे. ये चारों कायस्थ, राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण का प्रतिनिधित्व करते थे. पूरे प्रदेश में अभियान चलाकर एस फोर ने अगड़ी जाति के साथ हो रही नाइंसाफी को मुद्दा बनाया. भारी भीड़ खींचने वाली इनकी रैलियों में सवर्ण आयोग बनाने और सियासी हिस्सेदारी के सवाल प्रमुखता से उठे. नीतीश सरकार ने 14 प्रतिशत वोट बैंक की मांग को देखते हुए ऊँची जाति आयोग का गठन कर दिया और उसके बाद यह आन्दोलन धीमा पड़ गया. अभी एस फोर के विचार श्रृंखला के तहत अलग-अलग जिलों में अलग-अलग नाम से कई संगठन इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं.

एस फोर के संस्थापक संजय वर्मा कहते हैं कि यह ग्रुप एक राजनीतिक विचार केंद्र के रूप में थी. पूरे राज्य में ऊँची जाति की जबरदस्त गोलबंदी हुई, नीतीश कुमार ने हमारी मांग मानते हुए सवर्ण आयोग का गठन भी किया. वो नीतीश कुमार से मांग करते हैं कि वो एनडीए के प्रमुख नेता होने के नाते राष्ट्रीय ऊँची जाति आयोग के गठन हेतु पहल करें.

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *