BJP का डैमेज कंट्रोल ही हो गया डैमेज

मनोज कुमार सिंह
कल दिनभर भारतीय जनता पार्टी के अंदर के तूफान और विरोध को कंट्रोल करने के लिए मुख्यमंत्री द्वारा फार्मूला तय किया गया। प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा बजट सत्र छोड़कर दिल्ली से भागे-भागे रांची आए। रांची आकर उन्होंने अलग-अलग हिस्से में विधायकों से मुलाकात की, उनकी भावनाएं जानी और फिर डैमेज कंट्रोल का कदम उठाया गया लेकिन भाजपा के विधायकों के अंदर ही विवाद का एक नया मोड़ आ गया। राज्य के गैर अधिसूचित जिलों में होने वाली नौकरियों लिए नियोजन नीति की समीक्षा के लिए पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय कमेटी बनाई गयी- जिसका अध्यक्ष भू राजस्व मंत्री अमर बाउरी को बनाया गया, समिति के अन्य सदस्य राधा कृष्ण किशोर, सत्येंद्र नाथ तिवारी, राज सिन्हा और अमित मंडल के साथ-साथ निधि खरे प्रधान सचिव कार्मिक एवं राजभाषा विभाग को सदस्य सचिव भी बनाया गया। यह वही विधायक हैं, जिन्होंने विगत दिनों नियोजन नीति के विरुद्ध सरकार को पत्र लिखा था लेकिन पत्र लिखने वालों विधायकों के भीतर ही असंतोष का भाव दिखने लगा। उनका कहना था कि सरकार द्वारा नियोजन नीति पर कमेटी बनाई गई है, जबकि हमारी मांग स्थानीय नीति और नियोजन नीति दोनों में बदलाव की थी।

भाजपा के विधायक जय प्रकाश वर्मा का कहना है कि स्थानीय नीति में पहले संशोधन होना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि नियोजन नीति की जो कमेटी बनाई गई है, उसमें एक भी आदिवासी विधायक का नाम नहीं है, वहीं दूसरी ओर विधायक शिवशंकर उरांव का कहना है कि कमेटी का दायरा केवल 11 जिलों तक सीमित किया गया है, जो उचित नहीं है, सरकार पहले झारखंड की स्थानीय नीति पर अपना विचार व्यक्त करे और उसे परिभाषित करे। सरकार द्वारा जो नियोजन नीति कमेटी बनाई गई है उसे 15 दिनों के अंदर सरकार को रिपोर्ट सबमिट करना है, लेकिन यह मामला इतना आसान नहीं है कि मात्र कमेटी बना देने से समस्या का समाधान हो जाएगा बल्कि इन सभी फसाद को सुलझाने के पीछे सरकार की मनसा स्पष्ट नहीं दिख रही है। यह सारा विवाद का एक सूत्र राज्य के लाखों नौजवानों के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है, दूसरी ओर सरकार के सहयोगी दल आजसू कोटा से बने मंत्री सी पी चौधरी का भी कहना है कि हमने मुख्यमंत्री को दो-दो बार पत्र लिखकर स्थानीय नीति में संशोधन की मांग की है। अब यह सारा मामला स्थानीय और नियोजन नीति के बीच का नहीं हो कर वर्चस्व की लड़ाई की ओर बढ़ता दिख रहा है। पहली बार राज्य के पांच मंत्री बोले कि CM से बात हो गई है, स्थानीय नीति में संशोधन होगा। यदि इनके वक्तव्य को सही माना जाए तो फिर सरकार ने केवल नियोजन नीति की समीक्षा के लिए कमेटी क्यों बनाई? दरअसल आनन-फानन में डैमेज कंट्रोल के लिए इस कमेटी को बनाया गया जिससे असंतुष्ट विधायकों में आपसी फूट डालकर विरोध की तीव्रता को कम किया जा सके क्योंकि 1 दिन पहले राधा कृष्ण किशोर जो अर्जुन मुंडा के घर मिलने गए थे, उन्होंने ही यह बयान दिया कि कमेटी के गठन से डेडलॉक तो टूटा।

इसका मतलब यह हुआ कि मुख्यमंत्री अपनी ही पार्टी के विधायकों की मांगों को दरकिनार करने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं। अंदरखाने में लोगों का यह भी मानना है कि सरयू राय के प्रति जो विधायक सहानुभूति रखते थे, उनके अंदर फूट डालकर सरयू राय से अलग-थलग किया जा सके, तो क्या इतने बड़े गंभीर मामले पर भी सरकार राजनीति करने पर उतर गई है। असंतुष्ट विधायकों की भाषा से तो यही प्रतीत होता है, मंत्रियों की भाषा, विधायकों के एक गुट की भाषा और सरकार के क्रियाकलाप यह तीनों एक दिशा में नहीं दिख रहा है। इसका मतलब डैमेज कंट्रोल की प्रक्रिया ही डैमेज हो गई है। अब यह देखना है कि लक्ष्मण गिलुवा अगले कुछ दिनों में केंद्रीय नेतृत्व की भावना के साथ पार्टी के विधायकों को क्या मैसेज देते हैं क्योंकि समाचार पत्रों के माध्यम से सरयू राय ने कैबिनेट से इस्तीफा देने से मना कर दिया। अगले एक हफ्ते तक पार्टी के अंदर सस्पेंस बरकरार रहेगा दूसरी ओर सरकार के अंदर उठे इस तूफान पर प्रमुख विपक्षी पार्टी झामुमो ने चुटकी लेते हुए कहा है कि जब सरकार अपने विधायकों को संभाल नहीं पा रही है तो राज्य का क्या भला कर पाएगी। इसलिए मुख्यमंत्री को तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए झामुमो का मनोबल बढ़ा हुआ है लिट्टीपाड़ा उपचुनाव में झामुमो ने भाजपा को रिंग में पटक कर यह तो साबित कर दिया है कि संथाल के गढ़ में सेंध लगाना पार्टी के लिए आसान नहीं है. दूसरी ओर राजस्थान और बंगाल उपचुनाव में भाजपा की करारी शिकस्त के कारण अंदर ही अंदर संगठन के लोग गंभीर मंथन कर रहे हैं कि अब धीरे-धीरे स्थितियां बदल रही है और लोग भाजपा के खिलाफ गोलबंद भी होने लगे हैं, यदि झारखंड में कुशल नेतृत्व रहता तो इन मुद्दों पर पार्टी की लड़ाई सतह पर नहीं आती, लेकिन समय निकल चुका है और यह तो निश्चित है कि पार्टी के अंदर उठे इस तूफान को भले दबा दिया जाए लेकिन इसके नुकसान की भरपाई करना अत्यंत कठिन होगा। स्थानीय नीति और नियोजन नीति पर अचानक बड़े विरोध के पीछे राज्य के 55 परसेंट ओबीसी वर्ग की आरक्षण की विसंगति होना सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है।

राजनीति के जानकार पंडितों का तो यहां तक कहना है की सरकार सचेत नहीं हुई तो जिस प्रकार OBC के अंदर विरोध के स्वर उठ रहे हैं राज्य की दशा और दिशा निर्धारित करने में उनकी भूमिका सबसे अहम होगी और ऐसे नाजुक मौके पर एक मुहावरा चरितार्थ हो रहा है कि "घर फूटे, गंवार लूटे"।

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