भूमि पुत्र क्रसर मालिक परेशान, हजारों लोग सड़क पर

राज्य सरकार के तामझाम वाले वैश्विक निवेशक सम्मेलन के बाद भी झारखंड में गिने चुने ही निवेशक आए. यह कितनी दुखद बात है कि एक तरफ झारखंड सरकार बाहर से व्यवसाइयों को झारखंड में आमंत्रित कर रही है. उनका रेड कार्पेट वेलकम हो रहा है, दूसरी तरफ झारखंड के स्थानीय क्रसर मालिकों पर सरकार का मनमाना डंडा चल रहा है. अभी तक संथाल परगना के सैकड़ों क्रशर बंद कर दिए गए हैं और इस वजह से हजारों कामगार सड़क पर आ गए हैं. उनके घर का चूल्हा भी ठीक से नहीं जल रहा है. परेशान क्रसर मालिकों ने खनन विभाग से और जिला प्रशासन से त्राहिमाम की गुहार लगाई है, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण और खनन विभाग के अधिकारी कागजी जटिलताओं की आड़ में अभी भी क्रसर ऑनर्स के प्रति दोहरा रवैया अपना रहे हैं. इसे लेकर संथाल परगना के साहिबगंज, पाकुड़ और दुमका में स्थानीय लोगों में आक्रोश है.

कसर व्यवसाय से जुड़े लोग आरोप लगा रहे हैं कि पिछड़ी जाति और आदिवासी उद्यमियों की वजह से इस उद्योग के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है.

यह उद्योग झारखंड सरकार को रॉयल्टी तो देता ही है, साथ ही हजारों स्थानीय लोगों को रोजगार भी देता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर जिला प्रशासन इस उद्योग के प्रति ऐसा रवैया क्यों रखता है!

अधिकांश क्रशर मालिक प्रदूषण नियंत्रण के अनापत्ति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर चुके हैं. महीनों दौड़ने के बाद भी उन्हें अगर अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं मिलता है तो क्या प्रदूषण नियंत्रण के जिम्मेदारों पर कार्यवाही नहीं होनी चाहिए! जहां तक माइनिंग लीज का सवाल है उसकी जिम्मेवारी जिले के माइनिंग अधिकारियों की होती है, अगर कोई उद्योग माइनिंग लीज की तमाम अहर्ता पूरी नहीं करता तो उन्हें नोटिस किया जाना चाहिए. अपनी बात कहने का अवसर दिया जाना चाहिए. यही नैसर्गिक न्याय का तकाजा है और कानून भी. लेकिन बिना किसी मजबूत वजह के जिला प्रशासन का टास्क फोर्स ऐसे उद्योगों को बंद कर रहा है. यह मनमानी बंद होनी चाहिए.

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