भूमिपुत्रों पर सत्ता का कहर

साहिबगंज, पाकुड, दुमका जिलों में प्रशासन ने जिस प्रकार अवैध खनन एवं अवैध क्रशर के खिलाफ कार्रवाई की है उससे कई सवाल उठने लगे हैं। लोगों का कहना है कि प्रशासन सिर्फ छोटे और मध्यम क्रशर के खिलाफ कार्रवाई क्यों कर रही है जबकि बड़े क्रशर और ऑटोमेटिक प्लांट के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है।
हाल के दिनों में साहिबगंज, पाकुड़, दुमका जिलों में प्रशासन की ओर से अवैध खनन एवं अवैध क्रशर के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा रही है। सैकड़ों खनन भूखंड को छापेमारी कर सील किया गया और खनन संचालक गिरफ्तार किए गए। अवैध क्रशर के नाम पर चालू क्रशर जेसीबी से ध्वस्त किए जा रहे हैं। हजारों महिला-पुरुष मजदूरों की हंसी-ठिठोली के बीच क्रशर मशीन चलने की आवाज ठहर सी गई है। आज वे हजारों मजदूरों जिनके सुबह का पहला आहार क्रशरों के बीच ही होता था, आज बेरोजगारी की राह पर भविष्य की अंधकार को देख भयभीत हैं।
उनकी कई पीढ़ियों ने इन्हीं क्रशरों में काम करते हुए अपनी जिंदगी गुजारी है। हजारों मजदूरों का रात दिन इन्हीं क्रशरों के बीच गुजरा है। उनकी आंखों के सामने जिला प्रशासन जिस प्रकार क्रशर मशीनों को ध्वस्त कर रहा है उससे भय का माहौल बन गया है, उसने सपने में भी कभी इस प्रकार की कार्रवाई की बात नहीं सोची थी। रोज क्रशर में काम कर शाम के समय मजदूरी लेकर पेट भरने वाले मजदूरों के सामने भूखमरी की समस्या पैदा हो गई है।
गौर करने वाली बात है कि कार्रवाई उन मध्यम व छोटे क्रशरों पर हो रही है, जो पूरी तरह मैनुअल यानि मजदूरों पर आधारित हंै। बड़े क्रशर तो ऑटोमेटिक प्लांट हैं जहां 5 से 7 लोग ही संचालित कर लेते हैं, वहां मजदूरों की संख्या काफी कम होती है।
जिला प्रशासन की ताबड़तोड़ कार्रवाई से क्रशर संचालकों में हड़कंप मच गया है, संचालक समूह उपायुक्त से न्याय की गुहार लगा रहे हैं, उपायुक्त न्याय संगत व नियम के तहत कार्रवाई की बात कर रहे हैं। बता दें कि इस पूरे इलाके से देश के अधिकांश क्षेत्रों में स्टोन चिप्स एवं बोल्डर आपूर्ति होती है। लेकिन आज यहां भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई है। जानकारी के अनुसार, इस परिस्थिति के पीछे सत्ता से जुड़े लोगों का हाथ है। लगभग 8 से 10 दशक से पत्थर व्यवसाय जिले के रग रग में बसा है, आधी आबादी पत्थर व्यवसाय पर निर्भर है और देश व राज्य को अगाध राजस्व के रूप में धन उपलब्ध कराते आ रहा है। फिर अचानक वही खनन क्षेत्र और क्रशर आज अवैध कैसे हो गए ? ताबड़तोड़ छापेमारी और जेसीबी कैसे कहर ढाने लगा।
एक ओर करोड़ों खर्च करके केन्द्र सरकार की ओर से बेरोजगारी दूर करने के लिए सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्योग लगाने के लिए नई-नई योजनाओं को विज्ञापनों के जरिए दिखाए जा रहे हैं। राज्य की रघुवर सरकार करोड़ों खर्च कर मोमेंटम झारखंड आयोजित कर रही है ताकि निवेशक झारखंड में आएं और उद्योग लगाएं। दूसरी ओर रघुवर सरकार को बड़ा राजस्व देने वाले छोटे व मध्यम क्रशरों को बंद करने की आक्रामक कार्रवाई की सोच कहां से आई? यह लोगों को समझ नहीं आ रही है। आज पीड़ित कारोबारी समूह यह कहने को मजबूर हैं कि अच्छे दिनों का सपना दिखाने वाली सरकार की कथनी और करनी में काफी अंतर है, घोषणाओं और विज्ञापनों के अलग इनकी सत्ता की दबंगई अब गरीबों व मजदूरों पर दिखने लगी है। इन्हें सिर्फ पूंजीपतियों की चिंता है, बड़े औद्योगिक घरानों के हितों की चिंता है। आइए, हम आपको सरकार के क्रियाकलापों का सच बताते हैं कि सरकार कैसे झारखंडवासियों, मतदाताओं व मूलवासियों के खिलाफ अभियान छेड़ चुकी है।
आज जो छोटे व मध्यम क्रशर सरकार और उनके नुमाईंदों को अवैध दिख रहे हंै, वहां सिर्फ कागजों का ही पेंच है। उन कागजों या प्रमाण पत्रों को निर्गत करने वाला खनन विभाग और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यशैली सभी लोग जानते हैं, विभाग के पदाधिकारियों की निजी संपत्ति की जांच की जाय तो आप सोच भी नहीं सकते कि अरबों की संपत्ति उन्होंने कहां से और कैसे खड़ी की। शायद ही कोई महानगरों में आवास, बैंक लॉकरों में किलो की मात्रा में सोने -चांदी के जेवरात न हों। क्या यह खनन विभाग के पदाधिकारियों की निजी संपत्ति है ? बिना सरकार के शह या मिलीभगत के ये संभव है?
क्रशर के संचालन के लिए सबसे पहली कागजी आवश्यकता प्रदूषण बोर्ड द्वारा निर्गत प्रमाण पत्र है जिसके लिए भारी रकम चढ़ावे के साथ लगभग 6 महीने दुमका स्थित प्रदूषण बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय से लेकर रांची मुख्यालय तक का चक्कर काटना पड़ता है। वह भी सिर्फ एक साल की अवधि के लिए मान्य होता है। इसी पेंचीदा कागजी प्रक्रिया में छोटे व मध्यम कारोबारी कमजोर पड़ जाते हैं।

इलाके के क्रशर व्यापारियों ने जब कारोबारी स्थानीय विधायक से भी गुहार लगाई तो जवाब मिला कि इस मामले को सीधे मुख्यमंत्री देख रहे हैं, उनके अलावा कोई मदद नहीं कर सकता है।
साहिबगंज जिले के पुराने क्रशर संचालक मिथिलेश कुमार भगत कहते हैं कि आज हमलोगों का अस्तित्व खतरे में है, कई दशकों से पूर्वजों के द्वारा स्थापित क्रशर से ही घर परिवार का भरण पोषण चलता आया है। पुश्तैनी रोजगार पर इतनी बड़ी कार्रवाई से भय का वातावरण बन गया है। हमलोगों के मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है, वर्षों से ग्रामीण क्षेत्रों के मजदूरों से गहरा संबंध जुट चुका था। वह खत्म हो चला है। बिना पूर्व सूचना के ही, बिना समय दिए अचानक जेसीबी से क्रशर को ध्वस्त करना कहां का न्याय है?
श्री भगत आश्चर्य से कहते हैं कि हमलोग झारखंडवासी के साथ-साथ यहां के मतदाता भी हैं, कल तक सरकार के लिए हम सब ठीक थे और आज अचानक गलत हो गए, क्या इन्हीं दिनों के लिए हम व्यवसायी वर्ग झारखंड सरकार की जयकार करते रहे।
बाहरी व पूंजीपति लोग यहां आकर बड़े ऑटोमेटिक प्लांट लगाकर भारी भरकम चढ़ावा देकर घर बैठे कागजी प्रक्रिया पूरी कर पूरे पहाड़ को ही निगल रहे हैं, जिले के प्राचीन पहाड़ों का अस्तित्व समाप्ति के कगार पर है, क्या सरकार को उनसे पर्यावरण की रक्षा हो रही है ? क्या कागजी प्रक्रिया सरल एवं सुलभ बनाने की जिम्मेवारी सरकार की नहीं है ? श्री भगत कहते हैं कि यह सब झारखंडवासियों के विरूद्ध षड्यंत्र हो रहा है। हमलोग सभी कागजी प्रक्रिया पूरी करने को तैयार हैं, सरकार एवं विभाग इसमें मदद करे। छोटे की सुनने वाला कोई नहीं है, पूंजीपतियों की सबलोग सुनते हंै। श्री भगत कहते हैं कि वर्तमान सरकार के मापदंड में अंतर है, नीति स्पष्ट नहीं है, स्थानीय नागरिकों का अस्तित्व समाप्त करने की साजिश चल रही है, व्यवसायी वर्ग अनिश्चितता के माहौल में जी रहे हैं। अंत में श्री भगत कहते हैं कि सरकार सभी के लिए नियम एक समान छोटे व मध्यम कारोबारी की हैसियत के मुताबिक निर्धारित करे, हम सब पूरा करने का वादा करते हैं।
अन्य एक कारोबारी कहते हैं कि कागजी प्रक्रिया में भारी भरकम खर्च है जिसे छोटे कारोबारी पूरा करने में असक्षम हो रहे हैं, रोजी रोटी का सवाल है, विभाग एवं सरकार को इसमें मदद करनी चाहिए, कागजी प्रक्रिया सहज होनी चाहिए। कागजी प्रक्रिया पूरी तरह भ्रष्टाचार के दलदल में डूबा हुआ है, सरकार या तो इसमें शामिल है या भ्रष्टाचार समाप्त करने में पूरी तरह असक्षम है।
प्रतिष्ठित क्रशर व्यवसायी प्रकाश केडिया कहते हैं कि सरकार का नियम मानना सभी का दायित्व है, नियम के अनुसार काम होना चाहिए, विभाग को भी इसमें मदद करनी चाहिए। प्रक्रिया सहज व सरल होने से कारोबार में वृद्धि होगी और सरकार को भी राजस्व से अच्छी आमदनी होगी।

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