झारखंड में अपने ही डूबाएंगे कांग्रेस की नैया

कांग्रेस पार्टी अपने अंदरूनी लड़ाई और खेमेबंदी से ऊपर नहीं उठ पायी है। पार्टी नेता भाजपा के मिशन 2019 के मुकाबले खड़ा करने की कवायद में जुटने के बजाय आपसी मतभेद भूला नहीं पा रहे हैं। 6 सीटों पर सिमटी कांग्रेस को संगठन को मजबूत करने की जगह नेताओं के आपसी जूतमपैजार से गुजरना पड़ रहा है। ताजा मामला कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत और पार्टी के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत से जुड़ा है।

सुखदेव भगत ने सुबोधकांत सहाय के विपक्ष की समन्वय समिति में शामिल होने सवाल उठाया है। प्रदेश अध्यक्ष ने सुबोधकांत सहाय पर निशाना साधा है। इससे पार्टी के अंदर खाने खेमेबाजी को एक बार फिर हवा मिल गई है। इस नए विवाद ने एक बार फिर पार्टी के अंदर की राजनीति को सतह पर ला दिया है। विवाद को बढ़ता देख आखिरकार प्रदेश प्रभारी आरपीएन सिंह को दखल देना पड़ा उन्हें कहना पड़ा की बिना प्रदेश अध्यक्ष से अनुमति लिए किसी गैर कांग्रेसी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया जा सकता है।

सवाल उठता है कि अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस के नेता ये मानने के लिए तैयार क्यों नहीं है कि समान विचारधारा वाले दलों के साथ एकजुट होकर संघर्ष तेज करने के लिए किसी के अनुमति की जरुरत नहीं, आपसी सहयोग और विश्वास की जरुरत है। पार्टी नेताओं के अहम् से बड़ी चुनौती पार्टी को खड़ा करना, कार्यकर्ताओं में संगठन के प्रति भरोसा कायम करना है। झारखंड में पिछले कुछ दिनों से विपक्षी एकता कई मंचों पर देखने को मिली है। इससे सरकार के नीतियों के विरोध में विपक्ष कई मुद्दों पर दबाव बनाने में सफल भी हुआ है।

लेकिन ये सबकुछ तब हुआ जब पूरा विपक्ष एक मंच पर खड़ा नजर आया। कांग्रेस को पड़ोसी राज्य बिहार से भी सबक लेने की जरुरत है जहां अर्से बाद महागठबंधन की सरकार में कांग्रेस वजूद में आयी। बिहार में महागठबंधन की जीत ने पार्टी के लिए संजीवनी का काम किया।

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