जब जब पिछड़ा वर्ग की बात होगी, चन्दापुरी जी याद आयेंगे

रामलखन सिंह चन्दापुरी और पिछड़ा वर्ग ये दोनों ही शब्द समानार्थी हो गये हैं. मैं जब भी त्यागमूर्ति रामलखन सिंह चन्दापुरी जी के संघर्ष के बारे में पढ़ता हूं और उन्हें समझने की कोशिश करता हूं. हर बार पिछड़े वर्ग के लिए किये गये उनके संघर्ष का एक नया पन्ना मेरे सामने आ जाता है. केवल झारखंड – बिहार ही नहीं पूरे भारत वर्ष के पिछड़ा समाज के लिये त्यागमूर्ति चन्दापुरी जी ने जीवन पर्यंत जैसा संघर्ष किया, वह हम सभी के लिए एक जीवन ग्रन्थ की तरह है. आज अगर हमारा यह समाज अपने संवैधानिक हक की बात कर रहा है तो यह भी उसी महामानव की देन है. अगर उन्होंने संघर्ष कर पिछड़ा वर्ग यानि बैकवर्ड क्लास के इन दो शब्दों के लिए संविधान में जगह नहीं बनवाई होती और धारा 340 नहीं बना होता तो हम पिछड़ों का क्या होता! क्या हमें संवैधानिक हक मिल पाता ! कदापि नहीं . इसलिए मैं तो कहूंगा कि पूरे पिछड़े समाज के वह मूल आधार थे. आज उन्हीं की खोदी गयी नीव पर हर जगह पिछड़ा वर्ग की राजनीतिक शक्ति दिखती है. हमारे आपके जैसे लोग बड़े मंचों दिखते हैं.

जिस तरह कार्ल मार्क्स और साम्यवाद एक दूसरे के पूरक हैं, उसी तरह पिछड़ा वर्ग और आरएल चन्दापुरी एक दुसरे के पूरक हैं. तभी तो देश को आजादी मिलने के एक महीने के अंदर दूरद्रष्टा चन्दापुरी जी ने यह समझ लिया था कि बिना संघर्ष के इस आजादी में पिछड़े वर्ग के लिए सम्मानजनक राजनीतिक स्थान नहीं बन पायेगा. 15 अगस्त को हमें आजादी मिली और उन्होंने 10 सितंबर  1947 को पटना में बिहार प्रदेश पिछड़ा वर्ग संघ की स्थापना कर दी. इसी संघ के जरिये उन्होंने संविधान निर्मात्री परिषद के अध्यक्ष डॉ बाबा साहेब आंबेडकर से अनुरोध किया और उनके अथक प्रयासों से धारा 340 का मार्ग प्रशस्त हुआ, संविधान में पिछड़ा वर्ग का समावेश हुआ. अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो कोई भी संवैधानिक आयोग जैसे काका कालेलकर आयोग या मंडल आयोग असंवैधानिक घोषित हो जाता और हम पिछड़े समाज के लोग अपने अस्तित्व का राजनीतिक क्षितिज कभी ढूंढ ही नहीं पाते.

20 नवंबर 1923 को पटना जिले में त्यागमूर्ति रामलखन सिंह चन्दापुरी जी का जन्म जरुर हुआ था लेकिन उनका संघर्ष क्षेत्र तो पूरा देश रहा. त्यागमूर्ति चन्दापुरी जी ने एक बार कहा था, 6 हजार वर्ष की असभ्यता से सभ्यता की ओर हुई प्रगति को सही मानें तो मानव ने बहुत ही अल्प विकास किया है. आज उच्च तकनीकी उपलब्धियों के बावजूद गुलामी, जातीय असहिष्णुता, अन्याय, धार्मिक उत्पीड़न एवं अल्पसंख्यकों पर अत्याचार भयंकर रूप से मौजूद है. आज भी यह हो रहा है. कई दशक पहले उस मनीषी ने पिछड़े समाज पर आनेवाले खतरे को महसूस कर लिया था.

त्यागमूर्ति चन्दापुरी जी की संघर्ष यात्रा रचनात्मक थी. आज़ादी के बाद जब पूरा देश भीषण सांप्रदायिक दंगे में जल रहा था तो उस कठिन समय समय में चन्दापुरी जी मसौढ़ी क्षेत्र में सदभावना की मिशाल कायम कर रहे थे, जिसकी खुद गांधी जी ने तारीफ की थी. 1951 में जब डॉ आम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल पास नहीं होने के सवाल पर केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया तो त्यागमूर्ति चन्दापुरी ने डॉ बाबा साहेब आंबेडकर और डॉ राममनोहर लोहिया के साथ मिलकर पटना के गांधी मैदान में 6 नवंबर 1951 को विशाल रैली की. यहीं से देश की राजनीति में पिछड़ा और दलित एकता का सूत्रपात हुआ. दलित पिछड़े की सम्मिलित ताकत से बाद में देश का नक्शा बदलने वाला था. डॉ राममनोहर लोहिया और डॉ बाबा साहेब को एक मंच पर लाने का काम त्यागमूर्ति जी ही कर सकते थे. बाद में डॉ आंबेडकर जी के असमय निधन से चन्दापुरी जी अकेले पड़ गए अन्यथा दलित और पिछड़ों की एकता का राजनीतिक रूप कुछ अलग होता. फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कांग्रेस के सत्ता केन्द्रों के तमाम साजिशों और प्रलोभनों को दरकिनार कर पिछड़ों की एकता और उनकी सत्ता के लिए लगे रहे. इसी बौखलाहट में तत्कालीन बड़े कांग्रेसी नेताओं ने त्यागमूर्ति जी को राजनीति की मुख्यधारा में नहीं आने दिया अन्यथा राजनीति का स्वरूप आज कुछ और ही होता.

त्यागमूर्ति चन्दापुरी जी कभी संवैधानिक पदों पर नहीं रहे लेकिन पूरे देश में पिछड़ा और दलित समाज के बीच लोकप्रिय रहे. बाद में उनके द्वारा खड़ा किये गये संगठन ने अखिल भारतीय स्वरूप लिया और देश के हर हिस्से में संगठन ने जबरदस्त भूमिका निभायी.उन्होंने कई पुस्तकों की भी रचना की .भारत में ब्राह्मणवाद और पिछड़ा वर्ग आंदोलन, नेहरु बनाम चंदापुरी, आतंकवाद का जनक कौन ! चन्दापुरी, फादर ऑफ़ बैकवर्ड क्लासेज मूवमेंट, सेकेंड फ्रीडम स्ट्रगल आदि. ये कालजयी रचनायें चन्दापुरी की  संघर्ष यात्रा को अनंत समय तक जीवित रखेंगी.

मैं तो अंत में यही कहूँगा कि त्यागमूर्ति रामलखन सिंह चन्दापुरी जी का पूरा जीवन हम पिछड़ों की राजनीतिक आज़ादी के लिए संघर्ष करते हुए बीता. अब हमारी जिम्मेवारी है कि उनके बताये रास्ते पर चलकर हमलोग पिछड़ों की एकता और उनके साथ हुए अन्याय को खत्म करने के लिए काम करें. झारखंड की कुल आबादी के 50 प्रतिशत से अधिक की ताकत पिछड़े समाज की है. यदि प्रदेश का पिछड़ा समाज अपनी शक्ति को पहचान ले और संगठित होकर लक्ष्य की ओर बढ़े तो कुछ भी सम्भव है. लोकतंत्र में शक्ति उसी के पास है, जिसके पास संख्या बल है. मैं आप सभी को विश्वास दिलाता हूं कि चाहे वो आरक्षण की विसंगति का सवाल हो या जिले की बहाली में पिछड़ा समाज के नौजवानों के साथ हो रहे गैर बराबरी की बात. मैं आपके साथ हूं और हम मिलकर इस भेदभाव के खिलाफ लड़ेंगे. प्रदेश के सभी हमारे हैं. हम किसी का हक कम करने की बात नहीं करते, लेकिन बैकवर्ड समाज के नौजवानों की हकमारी नहीं होनी चाहिए. किसी भी समाज के साथ लगातार अगर नाइंसाफी हो तो वह समाज हर स्तर पर पिछड़ने लगता है, आज झारखंड में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े और पिछड़ रहे हैं. इससे इस समाज के अंदर बेचैनी है. इसका समाधान तुरंत ढूँढा जाना चाहिए.

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