आसान नहीं है गुजरात की डगर

नीलांशु रंजन

2019 के लोकसभा चुनाव में किला फतह करने का सपना देखने वाली भाजपा की पेशानी पे बल पड़ता दिखाई पड़ रहा है| गुजरात में - नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के गुजरात में। जी हां, दिसम्बर में होने वाले गुजरात विधान सभा चुनाव में भाजपा की डगर बहुत आसान नहीं दिख रही। 2002 में गुजरात की सत्ता में काबिज़ हुए नरेन्द्र मोदी गोधरा कांड के बाद धूमकेतू की तरह उठे और उनका तिलिस्म इतना बढ़ा कि वे दिल्ली तक पहुंच गए। ज़ाहिर है, नरेन्द्र मोदी को लगने लगा कि उनका क़द पार्टी से कहीं उपर है और धीरे-धीरे उन्होंने भाजपा के सारे दिग्गज पुराने नेताओं को सुनियोजित ढंग से हाशिये पर धकेल दिया। लेकिन पहली बार उनके ही घर और गढ़ गुजरात में उन्हें चुनौती मिल रही है और पहली बार उनका तिलिस्म टूटता नज़र आ रहा है। और हां, चुनौती मिल रही है तो उस कांग्रेस से जिससे उन्होंने देश को मुक्त करने की बात कही है। यह सिर्फ़ यह दर्शाता है कि यह शख्स अपनी सोच में कितना ग़ैर-लोकतांत्रिक है। जम्हूरियत में प्रतिपक्ष की अहम भूमिका होती है। जब विपक्ष रहेगा ही नहीं तो आपसे सवाल कौन करेगा? लोहिया से घोर मतभेद होने के बावजूद भी नेहरू हमेशा लोहिया की उपस्थिति सदन में चाहते थे। ये एक लोकतांत्रिक रवैया है। लेकिन 1942 के पचहत्तर साल पूरा होने पर जब सदन में विशेष सत्र का आयोजन हुआ तो नरेन्द्र मोदी ने भारत के पहले प्रधानमंत्री का नाम लेना भी मुनासिब नहीं समझा। ख़ैर, मैं अभी उस बहस में नहीं जाना चाहता हूं।

अभी मैं गुजरात चुनाव और भाजपा की चुनावी जीत की बात कर रहा हूं। अभी-अभी बिहार में भाजपा का दामन थामने वाली जदयू के एक नेता ने मुझसे निजी बातचीत में कहा कि गुजरात में भाजपा को उसकी औक़ात पता चल जाएगा। मैं इस बात का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूं कि जो गठबंधन में उसके साथ शामिल है, वह भी भाजपा की गिरती ग्राफ से ख़ुश है। भाजपा कितनी सीटें लाएगी गुजरात में, यह मैं नहीं जानता। लेकिन भाजपा की परेशानी बयां हो रही है वहां और उसकी बेचैनी का सबब है कांग्रेस और राहुल गांधी जिनकी छवि भाजपा ने सुनियोजित ढंग से सोशल मीडिया पर ‘पप्पु‘ की बनायी। पिछले सवा महीने में प्रधानमंत्री की गुजरात में पांच चुनावी यात्रा और धड़ल्ले से योजनाओं-परियोजनाओं का शिलान्यास और अमित शाह के साथ भाजपा के दिग्गजों का वहां डेरा डालना भाजपा की बेचैनी को बताने के लिए काफी है। भाजपा की झोली से पंद्रह-बीस सीटें भी छिन जाती हैं तो ज़ाहिर है कि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस को काफी फ़ायदा मिलेगा और इतना तो तय है कि भाजपा का झूट जैसे-जैसे सामने आ रहा है, वैसे-वैसे राहुल का ग्राफ भी बढ़ रहा है।

राहुल गांधी जिस नोटबंदी और जी.एस.टी को लेकर भाजपा और मोदी पर हमला बोल रहे हैं, वह निश्चित तौर पर भाजपा के लिए परेशानी की वजह बना हुआ है। भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ने नोटबंदी और जी.एस.टी पर हल्ला बोलकर भाजपा की बेचैनी को बढ़ा दिया है और तय है कि सरकार भी अब समझ रही है कि जी.एस.टी को लागू करने में हड़बड़ी हुई है और अर्थव्यवस्था डावांडोल हुई है। विकास दर में गिरावट लगातार है। लेकिन मोदी और अरुण जेटली लगातार लोगों को भरमाने में लगे हैं कि अर्थव्यवस्था तेज़ी से पटरी पे दौड़ रही है।

नोटबंदी के बाद क्या आतंकवादी गतिविधियां रुकीं? क्या काला धन पर अंकुश लगा? 99 फीसद पैसा नोटबंदी के बाद बैंक में वापस हुआ, तो काला धन कहां था ? राहुल गांधी ने सही पूछा है कि मोदी सरकार को आए तीन साल हो गए। अभी तक क्यों नहीं स्विस बैंक के खाता धारकों का नाम सामने आया? हर साल एक से डेढ करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वायदा किया गया था। नौकरी देना तो दूर, नोटबंदी के बाद लाखों लोग सड़क पर आ गए क्योंकि कई कंपनियां बंद हो गईं? आज सूरत के व्यापारियों का ख़स्ताहाल है। और पांच सौ व हज़ार के नोट को बंद कर दो हज़ार के नोट लाने के पीछे का औचित्य क्या है? यह तो काला धन को इकट्ठा करने को और आसान कर दिया।

देश सिर्फ़ जुमले बाजी से नहीं चलता। तीन साल तो गुज़र गए-कब आएंगे अच्छे दिन? युवा जानना चाहते हैं नरेन्द्र मोदी जी से। जिन युवाओं ने 2014 के चुनाव में मोदी जी में आस्था दिखाई थी, वे युवा ही आज हताश-निराश हैं। क्या कारण है कि छात्र संघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी डीयू, हैदराबाद और अन्य विश्वविद्यालयों में हार गई? मं जे.एन.यू की तो चर्चा भी नहीं कर रहा हूं।

गुजरात में ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर के कांग्रेस में शामिल होने से निश्चित तौर पर कांग्रेस में जान आई है। दलित नेता मेवाणी जिग्नेश का कांग्रेस से हाथ मिलाना भी तक़रीबन तय है। हार्दिक पटेल के न आने की सूरत में भी पटेल समुदाय भाजपा से खिसकता नज़र आ रहा है, यह वही समुदाय है जो भाजपा का वोटबैंक हुआ करता था। और साथ ही, राहुल गांधी की रणनीति में और प्रहार में जो गुणात्मक फर्क़ आया है, वह भी भाजपा के डगर को कठिन बना रहा है।

और अंत में, कांग्रेस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाली भाजपा क्या यह बताएगी कि अमित शाह के पुत्र जय शाह के बचाव में काबिना मंत्री पीयूष गोयल को क्यों आना पड़ा? पीयूष गोयल क्यों इतने बेचैन हैं? क्या जय शाह पार्टी के आदमी हैं? और नहीं हैं तो पार्टी को क्यों कूदना पड़ा उनके बचाव में? अगर यह आरोप अमित शाह पर लगता और तब पार्टी बचाव की मुद्रा में आती तो बात समझ में आती। लेकिन जय शाह के लिए क्यों? गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी जय शाह की वकालत कर दी। मुझे नहीं याद आता है कि कभी सोनिया गांधी या मनमोहन सिंह या फिर राहुल गांधी ने कभी प्रेस वार्ता कर रॉबर्ट वाड्रा का बचाव किया हो। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि रॉबर्ट वाड्रा निर्दोष हैं। यह तो जांच और अदालत का मामला है। लेकिन अमित शाह ने बयान दे दिया कि वे और उनका बेटा तो ग़लत कर ही नहीं सकते। लेकिन मन की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसपे चुप्पी साध ली। जो भी हो, लोग जवाब चाहते हैं और गुजरात चुनाव निश्चित रूप से भाजपा के लिए लिटमस टेस्ट है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व साहित्यकार हैं।

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