भाजपा के अहंकार की हार या कुछ और…

झारखंड के सिल्ली और गोमिया उपचुनाव के नतीजे क्या कहते हैं! क्या यह नतीजे राज्य सरकार के कामों पर जनता की नाराजगी की मुहर है या भाजपा और आजसू की आपसी खींचतान का नतीजा है. और इन नतीजों से भाजपा आजसू गठबंधन को सबक लेना चाहिए! ऐसे कई सवाल लोगों के मन में उठ रहे हैं. और चुनाव के नतीजों पर बहुत कुछ लिखा और कहा जा रहा है.
चुनाव में गोमिया और सिल्ली में NDA की हार जरूर हुई है लेकिन जनता ने NDA उम्मीदवारों को वोट देने में कोई कंजूसी नहीं की है. वह दोनों ही तरफ मिले हैं .गोमिया में तो मात्र 1400 वोटों के अंतर से झामुमो उम्मीदवार जीता है. सिल्ली में भी पिछले बार की तुलना में वोटों का अंतर कमा है, इसलिए इन नतीजों के आधार पर आजसू या भाजपा का राजनीतिक मरसिया गान करना उचित नहीं कहा जा सकता.
राजनीति संभावनाओं और समीकरणों का खेल है. विकास की के ढोल चाहे जितने पीटे जाएं लेकिन वोट देते वक्त क्षेत्र की जनता जाति और समीकरण के दुष्चक्र में फंस जाती है. छोटी-छोटी दुरभिसंधि से जीत हार के नतीजे तय होते हैं .
ऐसे में यह कहना सही होगा कि राज्य सरकार अपनी पीठ थपथपाने की बजाय जनता से असली संवाद करे. अधिकारियों वाला नकली संवाद नहीं. जनप्रतिनिधि सक्रिय हों, अब कामों के असर पर बात हो, घोषणाओं के असर पर बातें हो . केवल घोषणाएं ना की जाएं.

विपक्ष अभी इकट्ठा है. उर्जा से भरा हुआ है .उपचुनाव के नतीजों ने विपक्षी एकता में नई उर्जा फूंकी है. लेकिन यह ऊर्जा और एकता सही मायने में अगले चुनाव तक बनी रहे तो झारखंड बदलाव की तरफ बढ़ सकता है. अन्यथा फिर से फ्रैक्चर मैंडेट वाला दृश्य कहीं उपस्थित ना हो जाए. उसने झारखंड का बहुत नुकसान किया है.

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