बीजेपी का मिशन त्रिपुरा, आसान नहीं लेफ्ट को हराना

त्रिपुरा नॉर्थ ईस्ट का सबसे मजबूत किला माना जाता है. पिछले दो दशकों से ज्यादा से यहां लेफ्ट का एकछत्र राज चल रहा है. लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस किले में सेंध लगाने की जुगत में हैं. कोशिश कर रहे हैं कि इस इलाके के सियासी समीकरण के देखते हुए एक खास रणनीति बनाई जाए और लेफ्ट के सियासी दबदबा को खत्म किया जाए.

गौरतलब है कि 1978 के बाद से वाममोर्चा सिर्फ एक बार 1988-93 के दौरान राज्य के सत्ता से दूर रहा था. बाकी सभी विधानसभा चुनाव में लेफ्ट का कब्जा रहा है. 1998 से लगातार त्रिपुरा में 3 बार से सीपीएम के मुख्यमंत्री माणिक सरकार के सामने इस बार बीजेपी एक बड़ी चुनौती बनी है. राज्य में कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है. वहीं बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ा है. नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से बीजेपी ने नॉर्थ ईस्ट के क्षेत्रों पर फोकस किया है. इसके अलावा आरएसएस लगातार पूर्वोत्तर के क्षेत्रों में सक्रिय है.

बता दें कि त्रिपुरा के 2013 विधानसभा चुनाव में राज्य की कुल 60 सीटों में से वाममोर्चा ने 50 सीटें जीती थी, जिनमें से CPM को 49 और CPI को 1 सीट. जबकि कांग्रेस को 10 सीटों के साथ संतोष करना पड़ा था, लेकिन तीन साल के बाद 2016 में कांग्रेस के 6 विधायकों ने ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ज्वाइन कर लिया था. इन छह विधायकों टीएमसी भी रह नहीं सके और सभी 6 विधायकों ने अगस्त 2017 में बीजेपी ज्वाइन कर लिया.

त्रिपुरा में 3 बार के सीपीएम मुख्यमंत्री माणिक सरकार को चुनौती मिलना मुश्किल ही लगता है. बीजेपी ने 2013 चुनावों के 2 फीसदी वोट शेयर को बढ़ाकर 2014 में 6 फीसदी कर लिया था. हालांकि इस दौरान कांग्रेस 37 से घटकर 15 फीसदी पर पहुंच गई. त्रिपुरा विधानसभा की 60 सीटों में से 20 सीटें अनुसूचित जनजाति और 10 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं.

गौरतलब है कि 1978 के बाद वाम मोर्चा ने सबसे बेहतर जीत हासिल किया था. राज्य की 60 सीटों में से 56 पर जीत हासिल की थी. 1978 जैसा करिश्माई परिणाम लेफ्ट दोबारा नहीं दोहरा सकी है. माणिक सरकार ने ईमानदारी के बल पर 2013 के विधानसभा चुनाव में उतरे और उन्होंने 2008 के तुलना में एक सीट ज्यादा दर्ज करते हुए 50 सीटों का आंकड़ा छुआ था.

त्रिपुरा एक दौर में आदिवासी समुदाय की बाहुल्य राज्य के तौर पर था, लेकिन बांग्लादेश से बड़ी संख्या में शरणार्थियों के यहां आने से जनसंख्या का स्वरूप ही बदल गया. यही वजह है कि त्रिपुरा की राजनीति में बांग्ला-भाषी लोगों का वर्चस्व स्थापित हो गया है. जबकि वहीं आदिवासी राज्य के पहाड़ी इलाकों में रह रहे हैं. बीजेपी बंग्लादेशियों के खिलाफ सख्त रवैया अख्तियार किए हुए है. ऐसे में बीजेपी ने अपनी सियासी बिसात आरएसएस के जरिए बिछा रही है. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा को फतह करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है.

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