बिहार की दलित राजनीति चौराहे पर

बिहार की दलित राजनीति में पिछले कई वर्षों से उठापटक चल रही है. रामविलास पासवान इस राजनीति के कभी चैंपियन हुआ करते थे. बीच में रामविलास के फैक्टर को कुंद करने के लिए नीतीश कुमार ने नया कार्ड खेला दलित और महादलित का. जीतनराम मांझी जब एक्सीडेंटल मुख्यमंत्री बन गए तो वो खुदमुख्तारी में बिहार् के सबसे बड़े दलित नेता हो गए. नीतीश से झगडे और नयी पार्टी हम बनाने तक वो प्रदेश के सबसे बड़े महादलित चेहरा के तौर पर देखे जा रहे थे. उसी अंदाज़ में उन्होंने भाजपा से सीटें भी झटक लीं. लेकिन चुनावी नतीजों ने उनकी भी पोल पट्टी खोल कर रख दी.

इसके बाद फिर से नए दलित-महादलित चेहरे की तलाश सभी पार्टियों ने करनी शुरू कर दी. कांग्रेस ने अशोक चौधरी के रूप में नए दलित चेहरे पर दांव खेला.नीतीश के पास उदयनारायण चौधरी के रूप में मगध का एक महा दलित चेहरा था. लालू ने कई क्षेत्रीय चेहरों को तवज्जो दी. मुजफ्फरपुर में जयनारायण निषाद दल बदलते बदलते अपनी साख ही गंवा बैठे.

ऐसे में रामविलास पासवान की लोजपा ने इस अंधड़ के बीच अपनी उपस्थिति बनाये रखी. उन्होंने दिल्ली की सियासत अपने बेटे चिराग और बिहार में भाई पशुपति पारस को आगे बढ़ाया. अभी पारस बिहार सरकार में मंत्री हैं और विभाग में अपनी प्रशासनिक दक्षता साबित कर रहे हैं.

अशोक चौधरी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटने के बाद केवल लोजपा ही ऐसी पार्टी बची जो दलित वोट बैंक को लेकर चल रही है. इस पार्टी के पास चेहरा भी है और नीतियां भी.

इस सम्बन्ध में समाजशास्त्री एनके मंडल कहते हैं कि रामविलास पासवान बिहार की जमीन समझते हैं, इसलिए दलित वोट बैंक पर उनका गहरा प्रभाव है. लोजपा के पास कार्यकर्ताओं की टीम है. हर विधानसभा में उनका प्रभाव है. पारस के मंत्री बनने के बाद पार्टी में उत्साह जगा है. अगर यह उत्साह कायम रहा तो आनेवाले दिनों में इसके और सकारात्मक परिणाम दिखेंगे.

बिहार की सामाजिक संरचना ऐसी है कि अलग-अलग हिस्सों से अलग चेहरे ही अभी के दौर में प्रभावी साबित हो रहे हैं. प्रादेशिक स्वीकार्यता भले ही न हो लेकिन युवा दलित चेहरों में कई ऐसे हैं, जिनमें सम्भावना दिखती है. मगध, पूर्वी बिहार, मिथिलांचल, कोसी, सीमांचल और शाहाबाद के इलाके से कई फ्रेश चेहरे निकल रहे हैं, अगर लोजपा इन उत्साही युवाओं का रचनात्मक संरक्षण करे तो अगले चुनाव में वो सफलता की नयी कहानी लिख सकती है.

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद से अपनी छुट्टी के बाद अशोक चौधरी ने इसे दलित अपमान का मुद्दा बनाने की कोशिश की है. अगर यह मुद्दा परवान चढ़ा तो दलित राजनीति का विमर्श एक प्रमुख एजेंडा बन सकता है. और यह मामला ज्यादा सुलगा तो मुख्यधारा की पार्टियाँ भी इस चपेट में आने से नहीं बचेंगी. फिर असली और नकली दलित प्रेम की बात भी होगी और इसका सीधा फायदा लोजपा उठा सकती है.

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