बिहारी राजनीति का चरित्रहनन काल

-सियासी लड़ाई में डूब रहा विकास
-नीतीश, सुशील मोदी और तेज़स्वी की वज़ह से सियासी समर बन गया चरित्र हनन का मंच, शिकार हो रही बिहार कई विकास योजनाएं
-प्रमुख दलों के प्रवक्ता स्तरहीन बयान दे रहे। एक के बयान की काट में तुरंत लग जाता है दूसरा

यह बिहारी राजनीति का चरित्रहनन काल है। सियासी चमचों का स्वर्णकाल और विकास का मरणकाल भी। जिस नीतीश कुमार को विकास के लिए, राजनीतिक आदर्श के लिए जाना जाता था उनकी वो छवि खंडित हो रही है। नीतीश कुमार के समर्थकों को भी लगने लगा है कि वो सुशील मोदी की तरह निंदा अभियान में शामिल होकर वर्षों की बनाई अपनी छवि को तार-तार कर रहे हैं। तेजस्वी यादव के क्रिकेट कैरियर के एक पार्टी के दौरान एक लड़की के साथ ली गयी तस्वीर पर जेडीयू के प्रवक्ताओं की पूरी टीम ने जिस तरह का हौवा खड़ा करने की कोशिश की तथा जिस भाषा का इस्तेमाल किया उसने जेडीयू को ही बैकफूट पर ला खड़ा किया। क्योंकि थोड़ी ही देर में राजद ने और खासकर तेज़स्वी यादव ने नीतीश कुमार से इतने प्रतिप्रश्न पूछ डाले, जिनका जवाब आजतक जदयू या नीतीश कुमार नहीं दे पाए हैं!

अब राजद समर्थक गाँव टोलों तक अर्चना एक्सप्रेस की कहानी चटखारे ले लेकर सुना रहे हैं। गुडगाँव की कहानी सुना रहे हैं। अब ये कहानियां सच्ची हैं या झूठी, इसका जवाब देने के लिए हर जगह जेडीयू के प्रवक्ता तो उपलब्ध नहीं रहेंगे। ऐसे में लगातार एक मुख्यमंत्री उपहास का पात्र बनें यह ना तो बिहार के लिए अच्छा है और ना ही बिहारी राजनीति के लिए। पर इस चरित्रहनन अभियान की शुरुआत के लिए दोषी भी तो तो जदयू ही है ना। वरिष्ठ भाजपा नेता सीपी ठाकुर ऐसे अभियान की निंदा करते हुए कहते हैं कि विनाश काले विपरीत बुद्धि। वो जेडीयू को आड़े हाथों लेते हैं। ठाकुर कहते हैं कि राजनीतिक मतभेद तो लोकतंत्र में होता ही है। लेकिन ऐसे मतभेद अगर व्यक्तिगत चरित्रहनन के स्तर पर उतर जाएँ तो यह किसी के लिए भी उचित नहीं है। राजनीति का मजाक बनाकर रख दिया गया है। ऐसी घटिया राजनीति के जरिये आखिर कौन सा उदाहरण पेश करने की कोशिश की जा रही है!

समाजशास्त्री डॉ एस नारायण भी राजनीति के गिरते स्तर पर क्षोभ व्यक्त करते हैं। वो कहते हैं कि सियासी मतभेद व्यक्तिगत मनभेद में तब्दील होकर लोकतंत्र के लिए खतरा बन रहे हैं। इसका असर विकास कार्यों पर पड़ रहा है। सचमुच विकास के काम को छोडकर बिहारी राजनीति टिका टिप्पणी में उलझती दिख रही है। नयी बहाली रुकी पड़ी है। किसानों को पानी नहीं मिल रहा। बिजली फिर आँख मिचौली कर रही है। नकली खाद से किसान परेशान हैं। राशन में गड़बड़ी हो रही है। हर दिन नए घोटाले सामने आ रहे हैं। अब शौचालय घोटाला सामने है। महादलितों को ट्रेनिंग देने के नाम पर गड़बड़ी हुई। हर दिन एक नयी जाँच हो रही है। हो क्या गया सरकार को। नीतीश कुमार की बेदाग़ छवि वाली प्रतिमा खंडित होने लगी है। अपराधी बेलगाम हो रहे हैं। कई अच्छे अधिकारी बिहार से केंद्र चले गए। कई जाने की तैयारी में हैं।

तो क्या अपनी छवि की पूंजी से लोगों के दिलों पर राज करनेवाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सियासी राह भटक रही है ! युवा राजनीतिज्ञ क्रांति कुमार कहते हैं कि जो हुआ वो बहुत गलत हुआ। लेकिन नीतीश कुमार अपनी छवि को लेकर बेहद सतर्क हैं, उम्मीद है कि परिस्थिति बदलेगी।

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