बालू-बालू खेल रही है बिहार सरकार

-राज्य सरकार के तुगलकी आदेश से पूरे प्रदेश में अराजकता की स्थिति

बालू के चलते बिहार परेशान है। घर बनाने वाले आम लोगों से लेकर बिल्डिंग बनाने वाले ठेकेदार तक परेशान हैं। बालू की कीमत दोगुनी हो गयी है। ऐसा लग रहा है जैसे दिल्ली के प्याज़ की तरह बिहार में बालू मुफीद सियासी कारोबार हो गया है। ऐसा नहीं है कि बिहार की नदियां सूख गयी हैं, ऐसा भी नहीं है कि प्रदेश में ट्रांसपोर्टर्स की हड़ताल है। ऐसा केवल बिहार सरकार के एक तुगलकी आदेश की वज़ह से हुआ है। बालू का कृत्रिम संकट पैदा कर हर दिन नए नए अफ़साने लिखे जा रहे हैं। बालू और गिट्टी के कारोबार में लगे लाखों बेरोजगार युवा फिर से सड़क पर आने के अंदेशे से डरे हुए हैं।

दरअसल इस बालू राज की कहानी सियासी नफरत से शुरू होती है। महागठबंधन टूटने के बाद जब नयी एनडीए सरकार को लगा कि पहले लालू का आर्थिक स्रोत ख़त्म किया जाये। ऐसे में एनडीए के नीति निर्धारकों की नज़र बालू पर गयी, इन्हें लगा कि राजद के आर्थिक बालू को सुखा दिया जाये, इसके लिए पुलिस विभाग से लेकर माइंस के अधिकारियों तक को बालू राशनिंग में लगाया गया। बालू माफिया को ख़त्म करने के नाम पर सरकार ने विकास को ही बेपटरी कर दिया।

रामबदन राय

राजद के वरिष्ठ नेता रामबदन राय पूछते हैं कि माफिया ख़त्म हुआ या बिहार! वो कहते हैं कि अगर पहले माफिया था तो बालू एक ट्रक 2600 में आसानी से मिल जाता था, नीतीश सरकार की कडाई से जनता को 2000 में निर्बाध बालू अगर मिल जाता तो सभी मान लेते कि कोई खेल हो रहा था, लेकिन अभी तो 6000 में भी मुश्किल से बालू मिल रहा है। ऐसे में क्या जनता यह मान ले कि अब नए बालू माफिया खड़े हो गए हैं!

रामबदन राय की तरह बहुत सारे लोग यह सवाल पूछ रहे हैं और सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है। ऐसे में सरकार की इस अव्यवहारिक सोच पर सवाल उठने लगे हैं. जब पुरे प्रदेश में विरोध शुरू हो गया तो राज्य सरकार ने 2 या 3 पंचायत में किसी एक को बालू बेचने का लाइसेंस देने का फैसला किया। इसका भारी विरोध फिर शुरू हो गया है। इस फैसले से बालू के बाज़ार पर मोनोपोली होगी और हमेशा कृत्रिम संकट के नाम पर लोगों की जेब काटी जाएगी।

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