बकोरिया कांड पर बवाल

-मनोज कुमार सिंह-

8 जून 2015 को बकोरिया में हुए इनकाउंटर पर जब चारों तरफ से बवाल होने लगा और शिकायतें आने लगीं तो उस मामले को सीआइडी के जिम्मे सौंप दिया गया था। पुलिस विभाग के अंदर इस मामले को दबाने और लिपापोती करने का सारा प्रोग्राम पहले से बन चुका था ,लेकिन घटना तब बदल गई जब एमवी राव को एडीजी सीआइडी के रूप में पदस्थापित किया गया। एमवी राव ने जब बकोरिया कांड की फाइल को खोला तो आलाधिकारियों में बेचैनी बढ़ गई। राज्य के डीजीपी ने जांच को धीमा करने और इस फाइल को बंद करने का जब दबाव बनाया तो एमवी राव ने इसे मानने से इनकार कर दिया।

कहा तो यह भी जा रहा है कि एमवी राव को कुछ आइएएस अधिकारियों द्वारा यह समझाने का प्रयास किया गया था कि यदि बकोरिया कांड की सच्चाई सामने आ गई तो पुलिस डिपार्टमेंट की बदनामी होगी और सरकार भी संदेह के घेरे में आ जाएगी। इस प्रयास और दबाव को नहीं मानने के चलते आनन-फानन में एमवी राव को राज्य से बाहर दिल्ली ट्रांसफर कर दिया गया। दिल्ली जाकर एमवी राव ने सरकार को पत्र लिखा कि बकोरिया कांड को दबाने के लिए उन पर डीजीपी के द्वारा दबाव बनाया गया था। इस आरोप के बाद राज्य की सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट हो गईं, चारों तरफ से विरोध होने लगा, यहां तक की विगत बजट सत्र में इस मामले को लेकर सरकार और विपक्ष में घमासान चलता रहा। एक तरफ बकोरिया कांड का फर्जी एनकाउंटर मामला ,वहीं दूसरी ओर राज्य के मुख्य सचिव राजबाला वर्मा और उनके बेटे पर आरोप को लेकर मामला इतना गरमाया की सरकार को बैकफुट पर जाना पड़ा।

समय से पहले बजट सत्र को समाप्त कर सरकार यह सोचने पर मजबूर हो गई इन मामलों में कौन सा कदम उठाया जाए। सरकार के क्रियाकलाप से राज्य के मंत्री और सत्ता पक्ष के विधायक भी नाराज दिखे और उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपनी नाराजगी को सामने लाया भी। कई मोर्चों पर लीपापोती का भरपूर प्रयास यहां से दिल्ली तक करने का फॉर्मूला निकालने का जुगाड़ होता रहा लेकिन लगता है कि इस मामले का जीन बार- बार उभरकर सामने आ जा रहा है। पता नहीं सरकार मौन क्यों है? यदि राज्य के दो बड़े अधिकारी किसी कांड में शामिल हैं तो उनके विरुद्ध जांच होनी चाहिए और यदि वे दोषी पाए गए तो उन पर त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए थी।

सरकार की पारदर्शिता धूमिल हो गई और लोग दबी जुबान यह कहते नजर आए कि जब माननीय विधायक और जनप्रतिनिधियों की बात सरकार नहीं सुन रही है तो आम जनता की आवाज का क्या वैल्यू है। सरकार के नीति निर्धारकों को गंभीरता से इस मामले के परिणाम की तह तक जाना चाहिए और जनता के बीच बने संशय के वातावरण को दूर करना चाहिए। इसकी संभावना दिखती तो नहीं है लेकिन राजनीति में कुछ भी कहना असंभव ही होता है, यदि सरकार ने इन दोनों मामलों में कार्रवाई की तत्परता दिखाई होती तो जनता के बीच सरकार की छवि कुछ और होती, लेकिन पता नहीं सरकार की मंशा क्या है। इस प्रकार के माहौल से राज्य को एक और बड़ा नुकसान होने जा रहा है और वह यह है कि राज्य के प्रशासनिक पदाधिकारियों के बीच गोलबंदी और ध्रुवीकरण का मामला बढ़ेगा और नौकरशाहों के क्रियाकलाप में बेलगाम होने की प्रवृत्ति भी प्रबल होगी।

वैसे भी कहा जाता है कि राज्य के लगभग सभी मंत्री और विधायक लगातार यह शिकायत कर रहे हैं कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते हैं । यह भी एक गंभीर विषय है राज्य के कई मंत्रियों और सचिवों के बीच मनमुटाव की खबरें सार्वजनिक मंच से सुनी जाती हैं और इसके चलते ही जनता का काम समय पर नहीं हो पाता जो लोकतंत्र के लिए घातक और खतरनाक है।

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *