कॉरपोरेट और दलाल की भाषा बोल रही सरकारः बाबूलाल

स्कूलों में मास्टर नहीं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं : मरांडी

झारखण्ड में लगातार जन संघर्ष कर असली मुद्दों को लोगों के बीच ले जानेवाले झाविमो के अध्यक्ष और प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी से राजनीतिगुरु ने लम्बी बात की | पेश है इस बातचीत के मुख्य अंश……
सीएनटी- एसपीटी पर विपक्षी पार्टियों के विरोध और व्यापक जनाक्रोश के कारण सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा। इसे आप कैसे देखते हैं।
पहली बात तो यह कि सरकार का सीएनटी- एसपीटी के लेकर लाया गया संसोधन ही बिलकुल आधारहीन और गलत था। सरकार संसोधन के जरिये जो भी बचा हुआ जमीन था उसे लेने की साजिश कर रही है। इसलिए इस तरह का विरोध होना लाजिमी था। सत्ता में जो लोग बैठे हैं उनमें भी कुछ लोग जिन्होंने काफी दिनों तक अपनी जुबान बंद रखी थी वो भी खुल कर इसके विरोध में सामने आ गए। कड़िया मुंडा, अर्जुन मुंडा और सुदेश महतो ने भी इस मुद्दे पर सरकार के निर्णय का विरोध किया। आम जनता के व्यापक विरोध के कारण सरकार को अंततः विधेयक वापस लेना पड़ा। इस फैसले के खिलाफ 194 संगठनों ने राज्यपाल और केंद्र को ज्ञापन सौंपा था। पर सबसे बड़ी विडंबना ये है कि सरकार इस मुद्दे पर भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है। सीएनटी- एसपीटी को विकास की राह में बाधक बताया जा रहा है। देखा जाय तो सरकार आज जमीन दलालों और कारपोरेट घरानों के चंगुल में है। वहीं आज की तारिख में भी सरकार के पास काफी जमीन है। सरकार ने खनन, कल- कारखाने लगाने के लिए 15 लाख हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया है। जो लोग जिन्हें ज्ञान नहीं है वे इस एक्ट को विकास में बाधक बताते हैं। एक्ट के तहत भूमि अधिग्रहण का पूर्व से ही प्रावधान है। तो फिर इस नए संसोधन की जरूरत ही क्या है। सरकार को चाहिए कि वो एक आयोग बनाए जहां रैयतों, किसानों की बात सुनी जाए। फिर जो सुझाव आयेंगे उस पर विचार करे। सरकार कारपोरेट के लिए नहीं बनी है। जब रेंट या लीज पर अधिकतर कार्य किए जा रहे हैं तो फिर रैयतों, किसानों को बेदखल क्यों किया जा रहा है।
झारखंड राज्य के गठन को आज 17 साल हो गए, राज्यवासियों की कई आकांक्षाएं थी, पर इतने वर्षों बाद झारखंड को आप कहां खड़ा पाते हैं।
जब भी हम झारखंड या किसी भी अन्य राज्य की बात करते हैं तो हमें बाकी राज्यों की परिस्थितियों को भी देखना होगा। सभी राज्यों के संसाधन अलग- अलग हैं इसलिए परिस्थितियां भी भिन्न हैं। इसलिए विकास का मॉडल एक जैसा नहीं हो सकता। राज्य की भौगोलिक स्थिति से लेकर अन्य कई चीजें हैं जो उसके आर्थिक विकास का मानक बनती हैं। कहीं उद्योग तो कहीं टूरिज्म की संभावनाएं हैं। छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और दिल्ली सभी के विकास का मॉडल एक जैसा नहीं हो सकता है। जैसे अगर दिल्ली की बात की जाय तो वहां ट्रेडिंग की काफी संभावनाएं हैं इसलिए वह इस क्षेत्र में तेजी से विकास भी कर रहा है। वहीं गोवा और केरल जैसे राज्य भी हैं जो टूरिज्म के लिए जाने जाते हैं क्योंकि वहां उस प्रकार की संभावनाएं हैं। इसलिए हर राज्य के विकास के पैमाने अलग- अलग हैं। झारखंड के संदर्भ में रोड मैप बनाने की जरूरत है। राज्य को बनाने में आजादी के बाद से ही काफी लंबा संघर्ष किया गया है। झारखंड बनने के बाद लोगों को लगा कि अब इस क्षेत्र में ढेर सारे कल –कारखाने लगेंगे। नया प्रदेश बनेगा तो तेजी से विकास होगा। नया राज्य तो बना लेकिन दुर्भाग्य से आज भी समस्याएं वही हैं। बल्कि कहा जा सकता है कि आज स्थिति और भी ज्यादा भयावह है। लोगों को जमीन से बेदखल किया जा रहा है। आज भी सरकार उसी रास्ते पर है। आज भी वही बुनियादी समस्याएं हैं जो राज्य बनने के पहले थीं। राज्य आज भी वहीं खड़ा है। इसलिए झारखंड में विकास का मॉडल क्या होगा इसकी समीक्षा होनी चाहिए। पर यह अफसोस की बात है कि सत्ता में बैठे लोग इस पर विचार के लिए तैयार नहीं हैं। वो उसी रास्ते पर चल रहे हैं और लोगों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है। कल- कारखाने, डैम, खदान के नाम पर रैयतों से सरकार जबर्दस्ती जमीन लेने पर उतारू है।
एक ओर सरकार 1000 दिन की उपलब्धियां गिना रही है। वहीं दूसरी ओर किसान आत्महत्या कर रहे हैं। लोगों को उनकी जमीन से बेदखल करने के लिए गोलियां चलाई जा रही हैं। सरकार ने जमीन लेने के लिए सारी हदें पार कर दी हैं।
राज्य वहीं है, जहां पहले था, अगर राज्य बनने के तुरंत बाद इसको ध्यान में रखकर रोड मैप तैयार किया जाता तो आज स्थिति कुछ अलग होती। जहां तक राज्य के गठन के पहले की बात है तो उस समय भी कल-कारखाने और डैम बने और उस समय भी काफी संख्या में लोगों का विस्थापन हुआ था। लेकिन उस समय राज्य की जनसंख्या कम थी। अब यह जनसंख्या सवा तीन करोड़ हो गई है। आने वाले समय में रहने के लिए भी जमीन नहीं रह जाएगा। आज स्थिति पहले से कहीं ज्यादा खराब है। अभी देख लीजिए हरमू बाई-पास में रहने वाले लोगों ने जमीन देने से मना कर दिया है। ऐसे ही गांवों से लोगों को उजाड़ा जाएगा तो आगे उनके जीविकोपार्जन की भी समस्या पैदा हो जाएगी। उनके पास कमाई का कोई और साधन भी नहीं बचेगा। वे कहां जाएंगे। इसलिए सत्ता में बैठे लोगों को सोचना होगा, उन्हें इसके लिए रोड मैप तैयार करना होगा।


जेवीएम अगले चुनाव में किन सवालों को लेकर जनता के बीच जायेगा !
देखिए, विस्थापन, भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दे हमेशा चुनाव के केंद्र में रहे हैं। चाहे वह एचइसी का मुद्दा हो, मैथन डैम हो या फिर तेनुघाट से विस्थापन का मुद्दा हो। हमारा प्रयास है कि इन जन मुद्दों को गांव- गांव में ले जाकर लोगों को अपने हक से अवगत कराया जाय। इस चुनाव में भी हम इन्हीं समस्याओं के साथ जनता के बीच जायेंगे। लोगों को जागरूक करना होगा कि किस प्रकार उन्हें एक सोची समझी साजिश के तहत बेदखल किया जा रहा है। सरकार के रवैये से उन्हें अवगत कराया जाएगा। बड़कागांव से लेकर दुमका और खूंटी तक जन संघर्ष को बंदूक की बदौलत किस प्रकार कुचलने का प्रयास किया जा रहा है। हमारे नेता प्रदीप यादव जेल में हैं। हम संघर्ष करेंगे, जनता के बीच रहेंगे। पूरे प्रदेश में अलग-अलग जारी प्रतिरोध को मुख्य राजनीतिक एजेंडा बनायेंगे क्योंकि इन सभी मुद्दों का समाधान तो राजनीतिक तौर पर ही होगा, इसलिए यह जरूरी है कि हम इसे ही केन्द्रीय राजनीतिक मुद्दा बनाएं ।
पारदर्शी और भ्रष्टाचारमुक्त शासन देने की बात करने वाली पार्टी पर आज भ्रष्टाचार के कई संगीन आरोप लग रहे हैं | आप क्या कहेंगे।
देखिए आज झारखंड में सबसे खराब नेतृत्व है। कहीं भी देख लीजिए चारो ओर अव्यवस्था का माहौल है। प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई कहीं कोई व्यवस्था नहीं है। स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं तो अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं । मैट्रिक और इंटर में 60 फीसदी बच्चे फेल हो रहे हैं। बड़ी- बड़ी बात करते हैं कि राज्य में मेडिकल कॉलेज खुलेंगे। पाटलीपुत्र मेडिकल कॉलेज में सीटें नहीं बढ़ रही हैं एमसीआई ने प्रपोजल रिजेक्ट कर दिया है। सदर अस्पताल को चलाने के लिए कई बार टेंडर निकाला गया और इसको बनाने से लेकर मरम्मती में करोड़ों की लूट की गई। सरकार आज तक एक मेगावाट बिजली का उत्पादन नहीं कर पायी है। वहीं पतरातू थर्मल की जमीन एनटीपीसी को कौड़ी के भाव में दे दी गई। अडाणी को जमीन देने के लिए ऊर्जा नीति 2012 को ही बदल दिया गया। ये सारे मुद्दे चुनाव में भी रहेंगे। झारखंड से खनिजों का दोहन हो रहा है। राज्य को रेगिस्तान बनाया जा रहा है। जबकि खनन का कार्य वैज्ञानिक तरीके से भी किया जा सकता है। खादानों को खनन के बाद जस का तस छोड़ दिया जा रहा है। आज तक एक एकड़ जमीन भी समतल नहीं किया गया है। पर ये सब अब चलने नहीं दिया जाएगा। लोगों को इस षडयंत्र के खिलाफ जागरुक किया जाएगा। हमारा प्रयास है कि ये बातें लोगों की जुबान पर आये। इसके लिए हम गांव-गांव जाकर उन्हें प्रशिक्षित करेंगे।
ऐसा अक्सर देखा गया है कि जेवीएम सत्ता में नहीं आये इसके लिए बीजेपी नेता आपके बीजेपी में आने की बात करते रहते हैं। क्या यह चुनाव जेवीएम विपक्षी महागठबंधन के तहत चुनाव लड़ेगी।
काठ की हांडी बार- बार नहीं चढ़ाई जाती, चुनाव के पहले और बाद में बीजेपी के नेताओं ने किस प्रकार लोकतंत्र का मजाक बनाया और हमारी पार्टी को नुकसान पहुंचाया, ये सबकुछ जनता देख रही है। इसलिए इस बार लोगों ने मन बना लिया है कि बीजेपी को सबक सिखाना है। जहां तक गठबंधन की बात है तो इसकी कोशिश करेंगे। जनहित के लिए विपक्ष के महागठबंधन की अगर गुंजाइश होती है तो जरूर करेंगे। लेकिन ये बातें समय और परिस्थिति के अनुसार होती हैं। राजनीति में समझौते की गुंजाइश हमेशा रहती है। चुनाव के समय देखा जाएगा कि किस पार्टी के साथ गठबंधन किया जा सकता है।
जेवीएम के एमएलए को तोड़ा गया, इस मुद्दे पर पार्टी लगातार आवाज उठा रही है। विधानसभा अध्यक्ष से भी मामले के जल्द से जल्द निपटारे की मांग की जा रही है। पर जिस प्रकार सुनवाई में देरी हो रही है इस पर आप क्या कहेंगे।
मैं शुरू से कहता आ रहा हूं कि बीजेपी ने सभी लोकतांत्रिक मर्यादाएं तोड़ दी हैं। वह बेईमानी पर उतर आया है। संविधान की 10 वीं अनुसूची में यह स्पष्ट लिखा हुआ है कि ऐसे लोगों की सदस्यता रद हो सकती है। पूरी दुनिया ने देखा है कि ये सभी जेवीएम के चुनाव चिन्ह् पर लड़े। पर बीजेपी ने इन्हें पद और पैसे का लालच देकर पार्टी में लाया कुछ लोगों को मंत्री बनाया वहीं कुछ को पैसे भी दिए गए। इसके बावजूद विधान सभा अध्यक्ष मामले को जानबूझ कर लटका रहे हैं। अगर कानून सम्मत है तो तुरंत फैसला दें। इनका असली चेहरा जनता समझ रही है। जेवीएम भी चुनाव में इन मुद्दों को लेकर मैदान में जाएगा ।

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