कहीं जुमला बन कर न रह जाए आयुष्मान भारत योजना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड से विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना आयुष्मान भारत की शुरुआत कर दी है। इसका सीधा लाभ झारखंड के 57 लाख गरीब परिवारों को मिलेगा। वे पांच लाख तक का इलाज फ्री में करा पाएंगे। बताया जा रहा है कि इसके लिए अब तक राज्य के 206 सरकारी अस्पतालों को सूचीबद्ध कर लिया गया है। वहीं कुल 365 निजी अस्पतालों के आवेदन सूचीबद्ध होने के लिए प्रक्रियाधीन हैं।
इन सब के बीच बड़ा सवाल ये है कि राज्य में चिकित्सा व्यवस्था की जो बुनियादी स्थिति है उसके भरोसे आयुष्मान भारत की योजना को कैसे अमली जामा पहनाया जाएगा।

देश के प्रति एक हजार लोगों पर 1 डॉक्टर के मुकाबले झारखंड में 18,518 लोगों पर 1 डॉक्टर हैं। अगर स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स की बात करें तो जरूरत के मुकाबले यहां मात्र 4.5 फीसदी ही स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स हैं। राज्य को 994 स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स की जरूरत है, लेकिन मात्र 45 डॉक्टर्स विभिन्न अस्पतालों में कार्यरत हैं। इसके अलावा राज्य के कुल 1538 स्वास्थ्य केंद्रों में से 1015 केंद्र अभी भी निर्माणाधीन अवस्था में ही हैं। राज्यभर की सवा तीन करोड़ जनता के लिए सिर्फ 256 एंबुलेंस की व्यवस्था है। जबकि सरकारी मानदंड के अनुसार प्रति एक लाख की आबादी पर एक एंबुलेंस जरूरी है।

वहीं, राज्य की राजधानी रांची में दस लाख से अधिक की आबादी के लिए मात्र 20 एंबुलेंस हैं। जानकारी के अनुसार रिम्स में ही प्रतिदिन लगभग 1200 मरीज इलाज कराने आते हैं। राज्य के कई सरकारी अस्पतालों में जरूरी दवाइयों की भी किल्लत रहती है। ऐसे में झारखंड के 57 लाख चिह्नित परिवारों को प्रधानमंत्री के भावी आयुष्मान भारत योजना का लाभ कैसे मिलेगा यह देखना होगा।

बहरहाल, आयुष्मान भारत योजना पर विपक्षी दलों ने भी खूब निशाना साधा है। झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने कहा है कि सरकार को पहले राज्य में डॉक्टरों और अस्पतालों की चिंता करनी चाहिए तभी लोगों को सही से इलाज मिल पाएगा। कांग्रेस नेता सुबोधकांत सहाय ने कहा है कि मूलभूत जरुरतों को पूरा किए बगैर यह योजना सफल नहीं हो सकती है।

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