खामोश रहते-रहते आखिर फट ही पड़े अर्जुन

अर्जुन मुंडा जी हमारी पार्टी के सीनियर नेता हैं, वो कहीं और नहीं जाने वाले। उन्हें सरकार के स्तर पर लगातार नजरंदाज किया जाता रहा तो आखिर वो कितना चुप रहते ! संघ और संगठन के हर बड़े नेता के संपर्क में रहे अर्जुन मुंडा को जब लगा कि सरकार जानबूझकर उन्हें आइसोलेट करना चाहती है तो उन्होंने अपने सबसे अचूक हथियार मीडिया का इस्तेमाल किया। और वो क्या कर सकते थे !
अगर अब भी वो अपनी बात नहीं कहते तो आनेवाले समय में उनके समर्थक यह पूछेंगे न कि वक्त पर उन्होंने भी तो कुछ नहीं कहा। यह कहते हुए जब झारखण्ड भाजपा के एक बड़े नेता ने मुंडा के मीडिया में जाने का बचाव किया तो उनके चेहरे पर असमंजस था। यही असमंजस प्रदेश भाजपा के हर छोटे- बड़े चेहरे पर तब भी दिखा जब 11 जुलाई को अपने रांची दौरे पर आये भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी पदाधिकारियों की मीटिंग में अर्जुन की ओर इशारा करते हुए साफ- साफ कहा कि रघुवर सरकार तो अर्जुन मुंडा जी के बनाये रोड मैप पर ही चल रही है। तब बहुत से रघुवर समर्थकों को लग गया कि शायद राष्ट्रीय अध्यक्ष संतुलन बनाकर चलने की बात कर रहे हैं।
यह सधे इशारे में रघुवर दास को एक संकेत भी था कि पानी सर के ऊपर से मत बहने दीजिये। शाह को तब तक अर्जुन मुंडा की नाराजगी के बारे में पता चल चुका था, इसलिए उन्होंने अपने 11 जुलाई के झारखण्ड दौरे में एअरपोर्ट से लेकर वापसी तक हमेशा अर्जुन मुंडा को अपने साथ रखा। जब - जब रघुवर, शाह के साथ थे अर्जुन मुंडा भी उनके साथ थे। 12 जुलाई को मोरहाबादी के राजकीय अतिथिशाला से निकलने से पहले आजसू अध्यक्ष
सुदेश महतो, शाह से मिलने गए तब भी अर्जुन मुंडा उनके साथ थे।
अमित शाह ने यह दिखाने की पूरी कोशिश की कि भाजपा के अंदर सब कुछ ठीक है। इसलिए इस बार उन्होंने संगठन को कोई नया टास्क नहीं दिया,
ज्यादा वक्त समन्वय की बाजीगरी साधने में लगाया। झारखंडी राजनीति के मिजाज़ को अच्छी तरह समझने वाले अर्जुन मुंडा ने भी भाजपा नेतृत्व के
सामने इशारों-इशारों में बता ही दिया कि उनकी उपेक्षा कर झारखण्ड फतह का सपना भूल जाईये। राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने बोलते हुए अर्जुन मुंडा ने संथाल विद्रोह के अमर नायक तिलका मांझीकी कहानी सुनाते हुए अपने अंदाज़ में यह बयां भी कर दिया कि जब किसी आदिवासी के आत्मसम्मान को ठेस लगती है तो फिर वो किसी की नहीं सुनता। यह संवाद दरअसल उस सरकार के मुखिया को करारा जवाब था, जो आहिस्ता आहिस्ता पार्टी को आदिवासी विरोध के ऐसे मुहाने पर ला चुके हैं, जहां भाजपा के आदिवासी विधायक और सांसद भी अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। आखिर क्या है अर्जुन मुंडा की ताकत ! क्या वो प्रदेश की सियासत में अप्रासंगिक हो चुके हैं या अभी भी इनकी सियासी ताकत बची हुई है। राजनीति के बाज़ार में भाजपा ही नहीं विपक्ष के नेता भी मुंडा को मजाक में भूमिहार कहते हैं। यानि वो सबके हैं, चाहे मुंडा ने अपने वक्त किसी का काम किया हो अथवा नहीं, वो सबसे अच्छी तरह से संवाद करते रहे हैं। सारे दल में उनके मित्र हैं, शुभ चिन्तक हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी अपने ऊपर नियंत्रण रखना अर्जुन मुंडा की सबसे बड़ी सियासी ताकत है।
लेकिन तकरीबन 45 महीने की खामोशी के बाद उनके प्रासंगिक होने पर ही जब सवाल उठने लगे तो उन्होंने कई मुद्दों पर सरकार को आड़े हाथों लिया। आदिवासियों की नाराजगी के लिए सरकार के कदमों को जिम्मेवार ठहराया, भूमि अधिग्रहण नति में संशोधन पर खुलकर अपनी बात कही और सरकार के कामकाज पर सवाल उठा दिया। ऐसा करके प्रकारांतर से वो अगले चुनाव के लिए तैयार भी कर रहे हैं, जब आदिवासी किसी भी भाजपा नेता की नहीं सुनेंगे, तब मुंडा एकमात्र अपवाद हो सकते हैं। अपने व्यापक जनसमर्थन के चलते वो स्पष्ट बहुमत नहीं होने की स्थिति में भाजपा के खेवनहार बन सकते हैं। वास्तव में रघुवर दास और अर्जुन मुंडा का सियासी झगड़ा आज का नहीं है। दोनों ही जमशेदपुर से आते हैं, दोनों ही गैर भाजपा पृष्ठ भूमि के हैं। दोनों ही टाटा की धूप छांह से गुजरे हुए हैं। कभी अर्जुन मुंडा का इस्तकबाल बुलंद था, वक्त बदला। अभी रघुवर दास की जयकार है। वो लगातार अर्जुन मुंडा की अनदेखी कर रहे हैं। लेकिन मुंडा जनाधार वाले नेता हैं, उनका असर पूरे प्रदेश में है। संथाल से पलामू तक उनके समर्थक हैं। पार्टी में राजनाथ सिंह से लेकर कृष्ण गोपाल तक उनकी पहुंच है। रामलाल से लेकर सौदान सिंह तक से उनके अच्छे रिश्ते हैं। वर्तमान अध्यक्ष भले ही अर्जुन मुंडा को नापसंद करते हों लेकिन भाजपा जैसी पार्टी में अभी भी अर्जुन के तीर की चमक पूरी तरह निष्प्रभावी नहीं हुए हैं। वो वक्त की सियासत को समझ रहे हैं और अपने तीरों को चमकाने में लगे हुए हैं। पार्टी के अंदर मुख्यमंत्री के व्यवहार को लेकर जिस तरह से नाराजगी बढ़ रही है, मुंडा उसके समानांतर शक्ति केंद्र के रूप में उभर रहे हैं। पार्टी नेताओं से लेकर अधिकारियों तक का हुजूम उनके यहां उमड़ रहा है। वो सबके कंधे पर हाथ रखकर उनका हाल चाल पूछते हैं। परिवार से लेकर अन्य वर्कर्स के बारे में पूछते हैं। इससे कार्यकर्ता गदगद होकर लौटते हैं। मुख्यमंत्री की कार्यशैली को लेकर मुंडा अब अपनी नाराजगी छुपाते नहीं हैं। वो कहते हैं सीएम के आस - पास कुछ खास लोगों ने शार्ट सर्किट करा दिया है। इस वज़ह से कार्यकर्ता क्या पार्टी नेता भी सहज तरीके से सीएम तक नहीं पहुंच सकते। ऐसे में क्या उम्मीद रखेंगे कार्यकर्ता ! भाजपा की बहुमत वाली सरकार है, लोगों की उम्मीदें कार्यकर्ताओं के साथ जुड़ी होती हैं, वर्कर ही वोट मांगने जाते हैं, अगर कहीं कुछ गलत होता है तो पीड़ित इसी वर्कर के पास पहुंचता है बाद में विधायक और सांसद के पास जाता है। अब वर्कर अपनी बात कहां रखे! ऐसे कई सवाल हैं, जिसने भाजपा के इस अर्जुन को विचलित कर दिया है, इसलिए पार्टी फोरम पर अपनी बात कहते कहते थक चुके अर्जुन मुंडा ने अखबार के जरिये अपनी बात कही। इसका तत्काल असर भी दिखा। रांची से दिल्ली तक हरकत में आया। पार्टी के अध्यक्ष के बर्ताव से भी लगा जैसे सियासी रिश्तों के जमे बर्फ पिघल रहे हैं।

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