स्वास्थ्य विभाग में अराजकता, मुख्यमंत्री करें हस्तक्षेप

-मनोज कुमार सिंह-
वैसे तो झारखंड राज्य बनने के बाद से ही स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विभाग की स्थिति दयनीय है। राज्य के लगभग सभी जिला अस्पतालों और अनुमंडल स्तर के अस्पतालों की हालत इतनी जर्जर है कि उसे ठीक करना आज सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। पूर्व के किसी भी स्वास्थ्य मंत्री और सरकार ने कभी भी स्वास्थ्य सेवा को ठीक करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया। हालत यह है की राज्य का इकलौता बड़ा अस्पताल रिम्स आए दिन विवादों में घिरा रहता है। ऐसा लगता है कि रिम्स दलालों, माफियाओं एवं निजी अस्पतालों के संचालकों की मिलीभगत का अड्डा बन गया है।

स्वास्थ्य मंत्री जब कभी भी रिम्स का दौरा करते हैं तो ऐसा लगता है कि वह इस राज्य के विभागीय मंत्री नहीं हैं बल्कि अस्पताल के स्टाफ हैं। उनके नियंत्रण में ना तो डॉक्टर अनुशासित दिखते हैं और नहीं स्टाफ, आखिर क्या कारण है कि इतने साल गुजर जाने के बाद भी रिम्स जैसे महत्वपूर्ण अस्पताल की स्थिति ठीक नहीं हो पायी है। अस्पताल के चारों ओर दवा माफिया और दलालों का जमावड़ा लगा रहता है। मरीजों के दिखाने का पर्ची काउंटर हो अथवा वार्ड में मरीजों की देखभाल हो सब जगह अव्यवस्था ही अव्यवस्था दिखती है। आए दिन डॉक्टरों के बीच आपसी मारपीट खींचातानी और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ लगी हुई है। किसी भी प्रशासनिक व्यक्ति का कोई नियंत्रण नहीं दिखता है।

पिछले दिनों जो कुछ हुआ वह बेहद शर्मनाक है। सूबे की जनता ने समाचार पत्रों में देखा की मरीज मर रहे हैं, रिम्स की नर्स हड़ताल के दौरान हाथों में लाठी और डंडा लेकर मरीजों को और उनके साथ आने वाले अटेंडेंट को मारपीट कर रही हैं। मानवता शर्मसार हुई लेकिन सरकार का कोई जिम्मेदार अधिकारी या नेता आगे आकर इस भयावह स्थिति पर एक शब्द भी नहीं बोला। इस गंभीर मुद्दे पर मुख्यमंत्री को सीधे हस्तक्षेप करना चाहिए और रिम्स की अस्मिता को बचाने के लिए कदम उठाना चाहिए। यदि सरकार हर मोर्चे पर विफल हो गई हो, तो अस्पताल को बंद कर देना चाहिए। प्रत्येक वर्ष करोड़ों रुपए के घोटाला की खबरें आती हैं महंगी मशीनें खरीद कर रखे-रखे बर्बाद हो रही हैं। ऑपरेशन थिएटर में पानी नहीं मिलने के चलते हैं मरीजों का ऑपरेशन टाल दिया जाता है जिधर देखिए उधर लोग हताशा में भागते दौड़ते नजर आते हैं।

अस्पताल में न दवा है न सर्जिकल आइटम हैं और न ही सामान्य व्यवस्था। कहने को तो सरकार कागजों पर बहुत कुछ करने की बात कहती है, लेकिन राज्य के एकमात्र बड़े अस्पताल की हालत पर रोना आता है कुछ वरिष्ठ डॉक्टर अपनी चिंता इस रूप में बयां करते हैं कि रिम्स की हालत सुधारी जा सकती है लेकिन राजधानी के कुछ बड़े निजी अस्पताल व्यवस्था में बैठे हैं बड़े लोगों को अपने चंगुल में फंसा कर इस कदर रखा है कि चाह कर भी वे लोग आम लोगों के बारे में नहीं सोचते। मजबूरन लोगों को अपनी जमीन और संपत्ति बेचकर निजी अस्पतालों की तरफ भागना पड़ता है, ऐसा नहीं है कि रिम्स की स्थिति नहीं सुधारी जा सकती। जरूरत है तो सिर्फ इच्छाशक्ति की और ईमानदार सोच की।

राज्य के बड़े राजनेता, नौकरशाह, व्यापारी और सक्षम लोग सभी अपना और अपने परिवार का इलाज उन्हीं निजी अस्पतालों में करवाते हैं और सुनने में यह भी आता है की इन लोगों का इलाज वह अस्पताल मुफ्त में करते हैं और इन्हीं उपकारों के नीचे दबकर ये लोग रिम्स की हालत सुधरने देना नहीं चाहते। लेकिन किसी ना किसी को आगे आकर इस अराजकता की स्थिति को तो खत्म करनी ही पड़ेगी। रिम्स जैसे अस्पताल की बदहाली को दुरुस्त करना राज्य की गरीब जनता के इलाज को देखते हुए जरूरी है।

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