मोदी-शाह का ‘विजय रथ’ थामने उतरे अखिलेश- तेजस्वी

इन दिनों देश की राजनीति में दो नाम छाए हुए हैं, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव। ये दोनों युवा नेता अपनी-अपनी पार्टी के ‘युवराज’ हैं। इन दोनों ने ही सत्ता का स्वाद चखा हुआ है और आने वाले समय में अपने पिता की विरासत संभालने के लिए सियासी जमीन तैयार करने में जुटे हैं। तेजस्वी यादव महागठबंधन सरकार में बिहार के उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं, वहीं अखिलेश यादव सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह एक के बाद एक हर सूबे की सियासी जंग फतह करते जा रहे हैं। बीजेपी का राजनीतिक आधार लगातार फैल रहा है। मौजूदा वक्त में देश के 29 राज्यों में से 18 राज्यों में बीजेपी या उसके सहयोगी पार्टीयों की सरकार है। ऐसे में मोदी- शाह के ‘विजय रथ’ को थामने के लिए मुलायम के सियासी वारिस अखिलेश यादव और लालू प्रसाद यादव के वारिस तेजस्वी यादव सड़क पर उतरे हैं।

अखिलेश यादव देश के राजनीति की धूरी कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं वहीं तेजस्वी यादव जातीय राजनीति के गढ़ बिहार से हैं। दरअसल 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के हाथों से बीजेपी ने सत्ता छीनी है, तो वहीं तेजस्वी यादव के साथ नाता तोड़कर नीतीश कुमार बीजेपी के संग मिल गए हैं। फिलहाल दोनों के सामने एक ही चुनौती है और वह है भाजपा। यूं तो भाजपा पूरे विपक्ष के लिए चुनौती है पर इन दोनों को हाशिए पर भेजने में भाजपा का अहम योगदान रहा है। ऐसे में दोनों नेता इन दिनों अपने-अपने सूबे की सड़क पर उतरकर बीजेपी के खिलाफ माहौल बनाने में जुटे हैं, ताकि 2019 की सियासी जंग में बीजेपी को शिकस्त दे सकें। इसलिए मुमकिन है दोनों साथ आकर भाजपा के खिलाफ एक हो जायें। वैसे भी पुरानी कहावत है ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने केंद्र की ‘मोदी सरकार’ और प्रदेश की ‘योगी सरकार’ के खिलाफ बुधवार को ‘देश बचाओ- देश बनाओ’ अभियान शुरू किया। अभियान की शुरुआत उन्होंने फैजाबाद जिले से की जिसके अंतर्गत राम जन्मभूमि अयोध्या आती है। शायद अखिलेश को भी यह एहसास हो गया है कि ‘राम’ नाम के बिना उनकी नैया पार होने वाली नहीं है। उन्होंने यह अभियान पार्टी का खोया जनाधार वापस पाने के लिए शुरू किया है। अखिलेश पहले ही कह चुके हैं कि उन्हें भाजपा को रोकने के लिए बसपा के साथ जाने में भी कोई दिक्कत नहीं है। यह सही भी है क्योंकि अब भाजपा को रोकना किसी पार्टी के अकेले बूते की बात नहीं।

वहीं, तेजस्वी यादव ने बिहार में मोतिहारी से जनादेश अपमान यात्रा शुरू की है। उन्होंने नीतीश कुमार पर बिहार की 12 करोड़ की जनता के जनादेश के अपमान का आरोप लगाया था। जेडीयू के बागी नेता शरद यादव भी नीतीश के इस फैसले को ‘गलत’ बता चुके हैं। शरद यादव भी तीन दिवसीय यात्रा पर बिहार में हैं। आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने तो शरद यादव की तरफ दोस्ती का हाथ भी बढ़ाया है और कहा है कि उनकी पार्टी का ‘शरद यादव की जेडीयू’ से गठबंधन जारी रहेगा। भाजपा के सहयोगी और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी भी भाजपा से नाराज चल रहे हैं। ऐसे में तेजस्वी की यह यात्रा विपक्ष को एकजुट करने के लिहाज से सार्थक साबित हो सकती है।

तेजस्वी पूरी सूझ बूझ के साथ अपने अभियान को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। इसके जरिए नीतीश बीजेपी के खिलाफ जहां एक तरफ माहौल बनाने की उनकी कोशिश है तो वहीं दूसरी उनका इरादा है कि लालू के मुस्लिम, यादव समीकरण को दोबारा से मजबूत किया जाय। लालू इसी समीकरण के जरिए काफी समय तक बिहार की सत्ता पर कायम थे। वहीं अखिलेश के अभियान को 2019 के सियासी संग्राम के आगाज के तौर पर भी देखा जा रहा है, ताकि बीस महीने बाद होने वाले इस रण में वे सुल्तान बन सकें।

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