ओबीसी राजनीति की आंधी में कहीं उड़ न जाये सियासी ट्राइबल कार्ड!

-सबसे अधिक 54 फीसदी आबादी वाला ओबीसी जमात आर-पार की लड़ाई के मूड में
-ओबीसी आबादी को अन्य जगहों पर 27 फीसदी तो झारखण्ड में मिल रहा मात्र 14 फीसदी आरक्षण
-रांची जिला रोस्टर में ओबीसी को मात्र 2 फीसदी आरक्षण
-अर्जुन मुंडा के समय ओबीसी की आरक्षण सीमा बढाने की सिफारिश के लिए बनी थी कमिटी

झारखण्ड में ओबीसी राजनीति की तेज़ आंधी चल पड़ी है। इस आंधी का बहाव अगर इतना ही तेज़ रहा तो आदिवासी नामधारी पार्टियों के सामने सियासी संकट पैदा हो सकता है। अगर 54 फीसदी ओबीसी आबादी इसी तरह सियासी एकजुटता दिखाती रही तो फिर किसी और समीकरण की गुन्जाइश ही कहां बचती है। सारे बने बनाये समीकरण ही ध्वस्त हो जायेंगे। इस अहसास ने ही लम्बे समय से आदिवासी वोटबैंक चला रहे नेताओं के माथे पर पसीना ला दिया है। ओबीसी कार्ड की काट सोचने पर विवश हो रहे हैं कई दल। पर गुजरात के पार्टीदार समाज की तरह पिछड़ा समूह कुछ सुनने के मूड में नहीं है, झारखण्ड में बही यह सियासी आंधी इस बार सारी राजनीति को उलट पुलट करने के अंदाज़ में है। लम्बे समय से आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग कर रहे ओबीसी जमात को यह लगने लगा है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। इन्हें लग रहा है कि रांची और दिल्ली के तख़्त पर ओबीसी नेता बैठे हैं, ऐसे में इनकी यह मांग हर हालत में पूरी होनी चाहिए। सियासी हक की इस लड़ाई में युवा आगे हैं। हर जगह इस सवाल पर युवाओं की सियासी गोलबंदी तेज़ हो गयी है। हर जगह रैली और कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं, ओबीसी वोटर्स यह समझ रहा है कि मात्र 14 फीसदी आरक्षण देकर झारखण्ड में उनके साथ लगातार नाइंसाफी की जा रही है, जबकि पूरे देश में इन्हें 27 फीसदी आरक्षण मिल रहा है। प्रधानमंत्री को भी इस सियासी अन्याय के बारे में बताया गया है।

आखिर ओबीसी राजनीति में इस उबाल की वज़ह! पूर्व उप मुख्यमंत्री और इस जमात के कद्दावर नेता सुदेश महतो कहते हैं कि यह उबाल अन्याय के खिलाफ है। आखिर झारखण्ड की बहुसंख्यक ओबीसी जमात ही हमेशा अपनी कुर्बानी क्यों दे। झारखण्ड में 21 फीसदी अनुसूचित जनजाति को 24 फीसदी आरक्षण, अनुसूचित जाति को 10 फीसदी आरक्षण और 54 फीसदी ओबीसी को मात्र 14 फीसदी आरक्षण। ये तो अन्याय हुआ ना। पिछड़े वर्ग के युवाओं के हक छीने जा रहे हैं, ना इनके बच्चों को सहूलियत मिल रही है और ना इन युवाओं को नौकरी। ऐसे में इनके पास आन्दोलन के अलावा क्या विकल्प बच जाता है।

सुदेश महतो कहते हैं कि अर्जुन मुंडा जब मुख्यमंत्री थे तब ओबीसी की आरक्षण सीमा बढ़ाने को लेकर एक 5 सदस्यीय कमिटी बनाई गयी थी, अर्जुन मुंडा उसके अध्यक्ष थे, सुदेश महतो भी उसके सदस्य थे। अल्पमत की सरकार थी, सरकार गिरने के बाद उसपर कुछ हुआ ही नहीं। अभी तो बहुमत की सरकार है और खुद मुख्यमंत्री ओबीसी के हैं। दिल्ली में हमारे प्रधानमंत्री ओबीसी हैं, ऐसे में इस सरकार को राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी चाहिए, अन्यथा हमें आन्दोलन के रास्ते पर जाना पड़ेगा।

सुदेश महतो कहते हैं कि झारखण्ड में दो लेयर है आरक्षण का, एक राज्य स्तर का और दूसरा जिला स्तर का। वह बताते हैं कि जिले में स्थानीयता के हिसाब से होनेवाली बहालियों का और भी बुरा हाल है, रांची जिले का उदाहरण देते हुए इन्होने कहा कि यहाँ ओबीसी को मात्र 2 फीसदी ही आरक्षण मिलता है, इस वज़ह से स्थानीय जिलास्तर की अधिकांश नौकरी मंै ओबीसी युवा पिछड़ जाते हैं। इस असमानता और विसंगति को दूर करना ही होगा। अब राज्य सरकार कोई भी सियासी बहाना नहीं बना सकती। आखिर ये ओबीसी समाज के भविष्य का सवाल है। आजसू इसपर चुप नहीं बैठ सकता। हम लगातार राज्य और केंद्र सरकार को इस विसंगति और अन्याय के बारे में बता रहे हैं।

50 फीसदी आरक्षण वाली सीमा तमिलनाडु और पडोसी ओडिशा समेत कई राज्यों ने तोड़ी है। फिर झारखण्ड में ये क्यों नहीं टूट सकता। सुदेश कहते हैं कि हम किसी का आरक्षण कम करने के बारे में नहीं कहते। बाकी समाज को भी आरक्षण मिले लेकिन ओबीसी का कम क्यों हो। आबादी के लिहाज़ से सबसे बड़े समाज के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं होनी चाहिए।

ओबीसी समाज के बड़े नेता और बाबूलाल मरांडी की सरकार में मंत्री रहे लालचंद महतो भी इस विषय पर कई बार आन्दोलन कर चुके हैं। वह कहते हैं कि सदान ही झारखण्ड के मूलवासी हैं। हर जगह मूलवासी लाभान्वित होते हैं लेकिन झारखण्ड में मूलवासियों के साथ सौतेला व्यवहार होता रहा है। कम संख्या में होने के बाद भी ज्यादातर सरकारी सुविधाएँ केवल अनुसूचित जनजाति के खाते में ही चली जाती है। लालचंद महतो कहते हैं कि अब यह नहीं चलेगा।

कई राजनीतिक जानकार कहते हैं कि झारखण्ड में कुडमी समेत अन्य ओबीसी के साथ नाइंसाफी हुई है। इनका मानना है कि अगर ओबीसी के मामले ने तूल पकड़ा तो ट्राइबल पॉलिटिक्स की हवा निकल सकती है फिर झामुमो और झाविमो जैसी पार्टी क्या करेगी!

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