5 करोड़ बिहारियों ने मानव श्रृंखला बनाकर कर किया खबरदार

-दहेज और बाल विवाह का विरोध
अपूर्व पराशर

हमारे पितृसत्तात्मक समाज ने महिलाओं को बहुत दबा कर रखा है और उन्हें दोयम दर्जे का माना है । बहुत सी कुरीतियों जैसे दहेज और बाल विवाह ने उनकी जिंदगी को तबाह करने का ही काम किया हैं और उन्हें बोझ ना होते हुए भी बोझ बना दिया है । लाचार माँ - बाप को दहेज देकर ही अपने बेटियों को विवाह के बंधन से अवगत कराना पड़ता हैं। लड़का जिस पोजीशन पे है उस हिसाब से उसकी बोली लगती है। सरकारी नौकर, प्रोफेसर,इंजिनीयर, डॉक्टर, वकील सबकी कीमत लगती है। ना चाहते हुए भी लड़की वालों को दहेज देना पड़ता है । यूरोप, भारत, अफ्रीका और दुनिया के अन्य भागों में दहेज प्रथा का लंबा इतिहास है। भारत में इसे दहेज, हुँडा या वर-दक्षिणा के नाम से भी जाना जाता है तथा वधू के परिवार द्वारा नक़द या वस्तुओं के रूप में यह वर के परिवार को वधू के साथ दिया जाता है। देश में औसतन हर एक घंटे में एक महिला दहेज संबंधी कारणों से मौत का शिकार होती है और वर्ष 2007 से 2011 के बीच इस प्रकार के मामलों में काफी वृद्धि देखी गई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि विभिन्न राज्यों से वर्ष 2012 में दहेज हत्या के 8,233 मामले सामने आए। आंकड़ों का औसत बताता है कि प्रत्येक घंटे में एक महिला दहेज की बलि चढ़ रही है। आज पांच करोड़ बिहारियों ने मानव श्रृंखला बनाकर इन विकृतियों के खिलाफ जैसे सामाजिक युद्ध छेड़ दिया .

आइये जानते हैं दहेज के ख़िलाफ़ हमारे संविधान में क्या कानून हैं।
दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के अनुसार दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए जो कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा सम्पत्ति अथवा कीमती वस्तुओं के लिए अवैधानिक मांग के मामले से संबंधित है, के अन्तर्गत 3 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है। धारा 406 के अन्तर्गत लड़की के पति और ससुराल वालों के लिए 3 साल की कैद अथवा जुर्माना या दोनों, यदि वे लड़की के स्त्रीधन को उसे सौंपने से मना करते हैं। यदि किसी लड़की की विवाह के सात साल के भीतर असामान्य परिस्थितियों में मौत होती है और यह साबित कर दिया जाता है कि मौत से पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी के अन्तर्गत लड़की के पति और रिश्तेदारों को कम से कम सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है।
बाल विवाह भी समाज को कलंकित करने में अपना योगदान दे रहा है । बालविवाह केवल भारत में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में होते आएं हैं और समूचे विश्व में भारत का बालविवाह में दूसरा स्थान हैं। सम्पूर्ण भारत में विश्व के 40% बालविवाह होते हैं और समूचे भारत में 49% लड़कियों का विवाह 18 वर्ष की आयु से पूर्व ही हो जाता है । भारत में, बाल विवाह केरल राज्य, जो सबसे अधिक साक्षरता वाला राज्य है, में अब भी प्रचलन में है। यूनिसेफ (संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल आपात निधि) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में नगरीय क्षेत्रों से अधिक बाल विवाह होते है। आँकड़ो के अनुसार, बिहार में सबसे अधिक 68% बाल विवाह की घटनाएं होती है जबकि हिमाचल प्रदेश में सबसे कम 9% बाल विवाह होते है।

यह सोच कर बड़ा अजीब लगता हैं कि वह भारत जो अपने आप में एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा हैं उसमें आज भी एक ऐसी कुरीति जिन्दा है । एक ऐसी कुरीति जिसमें दो अपरिपक्व लोगो को जो आपस में बिलकुल अनजान हैं, उन्हें जबरन ज़िन्दगी भर साथ रहने के एक बंधन में बांध दिया जाता है, और वे दो अपरिपक्व बालक शायद पूरी ज़िन्दगी भर इस कुरीति से उनके ऊपर हुए अत्याचार से उभर नहीं पाते हैं . और नतीजे तलाक और मृत्यु तक पहुच जाते हैं।

तो क्या यह प्रथा भारत में आदिकाल से ही थी? या इसे बाद में प्रचलन में लाया गया? और यदि बाद में लाया गया तो इसका क्या कारण था?

यह प्रथा भारत में शुरू से नहीं थी। ये दिल्ली सल्तनत के समय में अस्तित्व में आया जब राजशाही प्रथा प्रचलन में थी। भारतीय बाल विवाह को लड़कियों को विदेशी शासकों से बलात्कार और अपहरण से बचाने के लिये एक हथियार के रुप में प्रयोग किया जाता था। बाल विवाह को शुरु करने का एक और कारण था कि बड़े बुजुर्गों को अपने पोतों को देखने की चाह अधिक होती थी, इसलिये वो कम आयु में ही बच्चों की शादी कर देते थे, जिससे कि मरने से पहले वो अपने पौत्रों के साथ कुछ समय बिता सकें।

बालविवाह के परिणाम?

बालविवाह के केवल दुष्परिणाम ही होते हैं जिनमें सबसे घातक शिशु व माता की मृत्यु दर में वृद्धि. उनका शारीरिक और मानसिक विकास पूर्ण नहीं हो पाता है. और वे अपनी जिम्मेदारियों का पूर्ण निर्वहन नहीं कर पाते हैं और इनसे एच.आई.वी. जैसे यौन संक्रमित रोग होने का खतरा हमेशा बना रहता है।

बालविवाह होने के कारण?

भारत में बालविवाह होने के कई कारण हैं जैसे-

1. लड़की की शादी को माता-पिता द्वारा अपने ऊपर एक बोझ समझना|

2. शिक्षा का अभाव |

3. रूढ़िवादिता का होना |

4. अन्धविश्वास |

5. निम्न आर्थिक स्थिति |

क्या बालविवाह को रोकने के लिए कुछ नहीं किया गया?

बालविवाह को रोकने के लिए इतिहास में कई लोग आगे आये जिनमें सबसे प्रमुख राजाराम मोहन राय, केशबचन्द्र सेन जिन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा एक बिल पास करवाया, जिसे स्पेशल मैरिज एक्ट कहा जाता हैं इसके अंतर्गत शादी के लिए लडको की उम्र 18 वर्ष एवं लडकियों की उम्र 14 वर्ष निर्धारित की गयी एवं इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। फिर भी सुधार न आने पर बाद में "चाइल्ड मैरिज रेस्ट्रॉन्ट" नामक बिल पास किया गया इसमें लडको की उम्र बढाकर 21 वर्ष और लडकियों की उम्र बढाकर 18 वर्ष कर दी गयी। स्वतंत्र भारत में भी सरकार द्वारा भी इसे रोकने के कई प्रयत्न किये गए और क़ानून बनाये गए, जिससे कुछ हद तक इनमे सुधार आया परन्तु ये पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुए । सरकार द्वारा कुछ क़ानून बनाये गए हैं जैसे बाल-विवाह निषेध अधिनियम 2006 जो अस्तित्व में हैं। ये अधिनियम बाल विवाह को आंशिक रुप से सीमित करने के स्थान पर इसे सख्ती से प्रतिबंधित करती है। इस कानून के अन्तर्गत, बच्चे अपनी इच्छा से वयस्क होने के दो साल के अन्दर अपने बाल विवाह को अवैध घोषित कर सकते है। किन्तु ये कानून मुस्लिमों पर लागू नहीं होता जो इस कानून की सबसे बड़ी कमी है।

बाल विवाह को रोकने हेतु उपाय?

बालविवाह रोकने हेतु कुछ उपाय हो सकते हैं जैसे-

1. समाज में जागरूकता फैलाना |

2. मीडिया इसे रोकने में प्रमुख भागीदारी निभा सकता है ।

3. शिक्षा का प्रसार |

4. ग़रीबी का उन्मूलन |

5. जहाँ मीडिया का प्रसार ना हो सके वहां नुक्कड़ नाटको का आयोजन करना चाहिए।

आज बिहार के करीब पांच करोड़ लोग आपस मे हाथ मिला कर दहेज और बाल विवाह के विरोध में मानव श्रृंखला का निर्माण कर रहे हैं। हर चौक - चौराहे, दफ़्तर, गली- मुहल्ले में ये नजारे आम हैं. स्वयं बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार भी पटना के गांधी मैदान में इस अभियान के हिस्सा बने । माना जा रहा है कि 13668.67 किमी लंबाई के साथ यह विश्व की सबसे बड़ी मानव श्रृंखला होगी और लिम्का बुक में स्थान प्राप्त करेगी। विश्व की सबसे बड़े मानव श्रृंखला के यादों को दिल मे संजोने के लिए सरकार 40 ड्रोन की मदद से फ़ोटो और वीडियोग्राफी करा रही है । प्रत्येक जिले को एक-एक ड्रोन उपलब्ध कराया गया है ।

बिहार हमेशा से समाज की कुरीतियों को खत्म करने के लिए आवाज उठाता रहा है, चाहे वो बीते वर्ष शराब बंदी का मामला हो या इस वर्ष दहेज और बाल विवाह का मामला हो। यह सिलसिला आगे भी चलता रहेगा। स्वयं महात्मा गांधी ने भी सत्याग्रह की शुरुआत सन: 1917 में नील की खेती वाले बिहार के चम्पारण जिले से किया था। 18 मार्च 1974 को पटना में हुए बिहार को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन को भी भुला नही जा सकता, जिसने बिहार ही नही बल्कि पूरे हिंदुस्तान की राजनीति को बदल के रख दिया था।
आज फिर बिहार दहेज और बाल विवाह के विरोध में खड़े होकर समाज को एक नए राह की ओर ले जा रहा है।

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