3 साल की सरकार, नेता तीसमार, युवा बेकार!

बहुत नाइंसाफी है ये...! फिल्म शोले का ये संवाद झारखण्ड की वर्तमान सरकारी व्यवस्था पर सटीक बैठता है. 3 साल की सरकार ने बेशक कई अच्छे काम भी किए हैं, लेकिन किसानों का सवाल अब भी व्यवस्था को मुंह चिढा रहा है. किसानों पर गोली चली. नौजवान बड़ी तादाद में बेकार हैं. सरकारी राशन नहीं मिलने से कई लोगों की भूख से मौत हो गयी. राजनीतिक रूप से प्रदेश के पिछड़ों में भयंकर असंतोष है, लेकिन सरकार कह रही है कि सब ठीक-ठाक है. सरकारी उपलब्धियों के विज्ञापन से अखबार भरे पड़े हैं. ऐसे में लोग कहने लगे हैं. तो बड़ी नाइंसाफी है सरदार!

रघुवर सरकार के तीन साल पूरे हो चुके हैं. तीन साल पुरे होने पर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपने मंत्रिमंडल सहयोगियों के साथ सरकारी जश्न किया. खूब लच्छेदार भाषण हुए. लेकिन इस भाषण के दूसरे ही दिन उनकी मुख्य सचिव विवादों में घिर गयी. मुख्य सचिव से पहले उनके खान सचिव और प्रधान सचिव विवादों में घिर चुके हैं. मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव सूचना एवं जनसंपर्क के सचिव भी हैं, ऐसे ही सीएम के सचिव उद्योग सचिव भी हैं, जिनपर मोमेंटम झारखण्ड के दौरान नकली कम्पनी से एमओ यू करने का आरोप लगा है. ऐसे में जब सभी बड़े सत्ता केन्द्रों पर विवाद की छाया है तो फिर जश्न कैसा! मंत्री और सचिव में हमेशा अनबन की सूचनाएं मिलती रहती है. कई वरिष्ठ नौकरशाह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर चले गए क्योंकि वो कुंठित हो रहे थे.

पुलिस की गोली से मारे गए किसान के परिजनों से पूछिये...आपको सच पता चल जायेगा. ऐसे ही झटके में गरीबों को मिलने वाला राशन बंद कर दिया गया. संतोषी जैसी झारखण्ड की बेटी भात-भात कहते मार गयी लेकिन सरकार इसे झूठलाने में ही लगी रही. समाधान निकालने की चर्चा तक नहीं हुई.

राजनीतिक रूप से भी झारखण्ड के गांव गरम हैं. तक़रीबन 52 फीसदी आबादी वाले पिछड़े कम आरक्षण को लेकर उबल रहे हैं. पिछले 17 सालों में यह समूह लगातार राजनीतिक उपेक्षा का शिकार रहा है. अब इस समूह के युवा किसी की सुनने के मूड में नहीं हैं. ऐसे में आनेवाले कल में यदि कोई हार्दिक पटेल इस प्रदेश में खड़ा होकर सत्ता की चाभी अपने हाथों में ले ले तो किसी की आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

इतनी उपलब्धियां क्या कम हैं, किसी भी सिस्टम के लिए! शेष आप खुद विकास की कहानी देखें.

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