रांची, कोडरमा और चतरा- नये समीकरणों से सबको खतरा

श्रीधर वत्स

कहते हैं राजनीति में कोई किसी का स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता. हाल ही में झारखंड में यह देखने को भी मिला, जब 15 दिन पहले तक भाजपा को पानी पीकर कोसने वाली राजद की प्रदेश अध्यक्ष अन्नपूर्णा देवी अचानक से भाजपा में चली आयी. इनके साथ समाजवादी गिरिनाथ ने भी मंडल छोड़कर कमंडल उठा लिया. एक तरह से राजद की पूरी ए टीम भाजपा हो गयी. अन्नपूर्णा को तो कोडरमा से टिकट मिल गया लेकिन गिरिनाथ चूक गए चतरा से. इस आयाराम-गयाराम पॉलिटिक्स ने प्रदेश का सियासी तापमान एकदम से बढ़ा दिया. चेहरे बदलने से इन लोकसभा क्षेत्रों के सियासी समीकरण भी रातों रात प्रभावित हुए. अब कैसी है इन लोकसभा क्षेत्रों की सियासी तस्वीर !

भाजपा के अंदर की बेचैनी खत्म हुई. काफी जद्दोजहद के बाद भाजपा ने आखिरकार झारखंड की तीन सीटों रांची, कोडरमा और चतरा पर से 6 अप्रेल को सस्पेंस खत्म कर दिया. इन तीन सीटों पर पिछले 10 दिनों से पार्टी मगजमारी कर रही थी. यहां पार्टी ने उम्मीदवार बदलने के संकेत दिए थे. प्रदेश अध्यक्ष ने बाकायदा संवाददाताओं को बताया था कि इन तीन सीटों के वर्तमान सांसदों का रिपोर्ट कार्ड ठीक नहीं था. इसके बाद रामटहल चौधरी के समर्थकों ने भाजपा प्रदेश कार्यालय में हंगामा भी किया. आख़िरकार भाजपा ने रांची सीट से वैश्य समुदाय के अन्य नेताओं नवीन जायसवाल और आदित्य साहू  के दावे को नकारते हुए संजय सेठ को रांची से और हाल ही में दल बदलकर राजद से भाजपा में आयी अन्नपूर्णा यादव को कोडरमा से टिकट दे दिया. चतरा सीट से सुनील सिंह को ना-ना कहने के बाद हां कहा गया.

संजय सेठ अभी झारखंड खादी बोर्ड के अध्यक्ष हैं, मुख्यमंत्री रघुवर दास के करीबियों में शुमार संजय सेठ के सामने कांग्रेस के कद्दावर नेता सुबोधकांत सहाय हैं वहीँ बेटिकट हुए रामटहल चौधरी की नाराजगी की छाया उनके पीछे-पीछे चलेगी. ऐसे में खुद भाजपा के ही कई नेता संजय सेठ की सियासी दुश्वारियों की चर्चा कर रहे हैं. ऐसे लोगों को लगता है कि अगर वैश्य समाज से ही टिकट देना था तो हटिया विधायक नवीन जायसवाल या भाजपा उपाध्यक्ष आदित्य साहू बेहतर विकल्प हो सकते थे.

अब रांची सीट के सियासी समीकरण साफ़ हो रहे हैं. यहां एक सप्ताह से फील्ड में केवल कांग्रेस उम्मीदवार सुबोधकांत सहाय ही दिख रहे थे, इसलिए सियासी गहमागहमी नदारद थी.सहाय महागठबंधन के उम्मीदवार हैं, इसलिए उनके साथ अल्पसंख्यक मतों के अलावा झामुमो के आदिवासी वोटरों का भी बोनस है. और सबसे बड़ी बात कि कांग्रेस के कुछ नेताओं को छोड़कर महागठबंधन में रांची में कम से कम कोई उम्मीदवार के साथ भीतरघात करने वाला सतह पर नहीं दिखता है जबकि इसके ठीक उलट भाजपा में कई चेहरे ऐसे हैं जो विरोध करने की स्थिति में तो नहीं हैं, लेकिन ऐसे नेताओं की निष्क्रियता भी पार्टी उम्मीदवार पर भारी पड़ सकती है.

रांची लोकसभा सीट पर ज्यादा वक़्त भाजपा का कब्जा रहा है. शहरी इलाके में भाजपा के कैडर वोटर हैं. मेरा बूथ, सबसे मजबूत अभियान चलाकर भाजपा ने अपना बूथ प्रबंधन बेहतर किया है. सक्रिय कार्यकर्ताओं की फौज भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में जुट चुकी हैं. जबकि कांग्रेस संगठन के स्तर पर कमजोर है. मुद्दा विहीन चुनाव में संगठन वोटरों को बूथ तक लाने का प्रभावी माध्यम है. ऐसे में संगठन की मजबूती के हिसाब से देखा जाये तो भाजपा बढत पर है.

चतरा सीट पर मुख्यमंत्री के विरोध के बावजूद सुनील सिंह को दोबारा टिकट मिलना यह साबित करता है कि रांची को छोड़कर अन्य सीटों पर सीएम की ज्यादा नहीं चली. बताया जा रहा है कि सौदान सिंह के करीबी होने का फायदा सुनील सिंह को मिला और कोडरमा से रविन्द्र राय का टिकट कटने के बाद भाजपा नेतृत्व को यह समझाया गया कि अगर यादव नेता अन्नपूर्णा देवी को कोडरमा से टिकट देने के बाद चतरा से गिरिनाथ सिंह को पार्टी टिकट देगी तो कार्यकर्ताओं में गलत मैसेज जायेगा. पार्टी को यह भी समझाया गया कि कांग्रेस और राजद के उम्मीदवार यादव समाज से हैं. ऐसे में एक क्षत्रिय नेता को चतरा से लड़ाया जाना चाहिए. इस तरह सुनील सिंह के नाम पर दोबारा चर्चा हुई.

चतरा सीट की वर्तमान स्थिति यह है कि कांग्रेस और राजद दोस्ताना मैच खेल रहे हैं. कांग्रेस ने बरही के तेज़ तर्रार विधायक मनोज यादव को चतरा से अपना उम्मीदवार बनाया है वहीँ राजद ने विवादित नेता सुभाष यादव को चतरा से उतारा है. सुभाष यादव के बारे में कहा जा रहा है कि वो बिहार में बालू के कारोबार से जुड़े हुए हैं और पार्टी के फण्ड मेनेजर भी हैं. इसलिए उनके नामांकन में खुद राजद के राजकुमार तेजस्वी यादव पहुंचे थे. सुभाष यादव की वज़ह से ही राजद से अन्नपूर्णा यादव, गिरिनाथ सिंह और चतरा के पूर्व विधायक जनार्दन पासवान  समेत कई नदे नेता भाजपा चले गए. राजद छोड़ चुके बड़े नेताओं का आरोप है कि इस बालू कारोबारी ने पार्टी को हाई जैक कर लिया है. इन दोनों नेताओं के अलावा लातेहार जिला परिषद् के उपाध्यक्ष राजेन्द्र साहू भी निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से मैदान में हैं. वैश्य विरादरी में राजेन्द्र साहू की अच्छी पकड़ है और माना जा रहा है कि इस समाज से आनेवाले साहू ज्यादा नुकसान भाजपा को ही पहुंचाएंगे. राजेन्द्र साहू स्थानीय बनाम बाहरी का नारा देकर मैदान में हैं. इनका कहना है कि प्रमुख दलों ने बाहरी लोगों को अपना उम्मीदवार बनाया है, बाहरी लोगों ने चतरा को चारागाह समझ लिया है, इसलिए जनता इस बार सबको सबक सिखाएगी.

पार्टी के कई बड़े नेता जैसे पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा खुद चुनाव लड़ रहे हैं. प्रदेश अध्यक्ष चाईबासा में कठिन लड़ाई में फंसे हैं, ऐसे में मुख्यमंत्री रघुवर दास पर ही पार्टी उम्मीदवारों को जिताने का भार है और वो गोड्डा में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सामने कई मंच से कह भी चुके हैं कि प्रदेश की सभी सीटें पार्टी को जीतकर देंगे. रघुवर दास के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसी साल विधानसभा के चुनाव भी होने हैं और अगर पार्टी ने लोकसभा में उम्मीद के अनुरूप बेहतर सियासी प्रदर्शन नहीं किया तो पार्टी में मुख्यमंत्री की स्थिति कमजोर होगी.

कोडरमा से राजद की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और लालू की करीबी रहीं अन्नपूर्णा देवी को भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया है. अपने ही पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रविन्द्र राय का टिकट काटकर अन्नपूर्णा के रूप में पार्टी ने एक महिला नेता को प्रतिनिधित्व तो दिया है लेकिन अन्नपूर्णा को हराकर विधायक बनी नीरा यादव क्या आसानी से इन्हें दिल्ली पहुँचने देंगी. यहां भाजपा कार्यकर्ता असहज हैं, इसके अलावा एक भी भूमिहार को टिकट नहीं देने से कोडरमा के भूमिहार वोटर नाराज़ हैं और वो बाबूलाल के साथ जा सकते हैं. अगर ऐसा हुआ तो अन्नपूर्णा की मुश्किलें भी बढ़ सकती है. कोडरमा में महागठबंधन की तरफ से पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी और माले से विधायक राजकुमार यादव चुनाव मैदान में हैं. ऐसे में कोडरमा सीट पर लड़ाई बेहद कठिन है. माले का अपना फिक्स्ड कैडर वोट है. हर चुनाव में राजकुमार यादव को तकरीबन एक लाख से डेढ़ लाख वोट मिल ही जाता है. ऐसे में कांग्रेस, जेवीएम और झारखंड मुक्ति मोर्चा मिलकर बाबूलाल मरांडी के लिए बेहतर तस्वीर बना रहे हैं.  राजद का भी यहां जनाधार रहा है और अन्नपूर्णा यादव तथा उनसे पहले उनके पति द्वारा बनाये गए राजद के जनाधार को अपने पाले में लाने की कोशिश अन्नपूर्णा भी करेगी और राजद भी. पहले राजद के साथ रहे यादव वोट अगर बंटे तभी बाबूलाल के लिए रास्ता बनेगा. अगर अन्नपूर्णा ने यादव वोटों को पूरी तरह अपने से जोड़े रखा तो अन्नपूर्णा की राह आसान होगी. फिलहाल तो अन्नपूर्णा यादव यादव बहुल आबादी वाले गांवों का दौरा कर रही हैं और अपने भाजपा में जाने के कारण उन्हें बता रही हैं ताकि कोई गिला शिकवा ना रहे और यादव वोट उन्हें बोनस के रूप में मिले. कोडरमा में भाजपा ने यही सोचकर अन्नपूर्णा को मैदान में उतारा है कि राजद के प्रभाव वाले यादव वोटों में इनकी सेंधमारी पार्टी को अभी और आगे भी फायदा पहुंचा सकती है.

कुल मिलाकर तीनों सीटों पर घमासान है. इन लोकसभा सीटों पर राजनीतिक तापमान गर्म है, सियासी समीकरण एकदम से उलट पुलट हो गए हैं. चतरा में राजद और कांग्रेस का दोस्ताना मैच दोनों पर भारी पड़ सकता है. कोडरमा में भूमिहारों की नाराजगी भाजपा को भारी पड़ सकती है और रांची में भाजपा का वैश्य कार्ड चल सकता है बशर्ते बेटिकट हुए रामटहल अपना बागी रुख नहीं मोड़ लेते हैं . इस चुनाव में कोई भी बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है. ऐसे में सरकार के काम और स्थानीय मुद्दे पर ही चुनाव लड़े जायेंगे. और स्थानीय मुद्दों के साथ स्थानीय चेहरे महत्वपूर्ण होंगे. जोर आजमाइश दोनों ही तरफ से है. मतदाता अभी मौन हैं और सभी उम्मीदवार इस मौन को वोटर्स की स्वीकारोक्ति समझने की भूल कर रहे हैं. 

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