रघुवर को गढ़ में घेरना नामुमकिन

जमशेदपुर के सीताराम डेरा में लोग सुबह की चाय की चुस्कियां ले रहे हैं लेकिन चाय की प्याली से निकलने वाली भाप में सियासत का तापमान भी घुल रहा है. सभी झारखंड की सबसे हॉट पोलिटिकल सीट को लेकर चर्चा में खासे मशगूल हैं. मुख्यमंत्री के खिलाफ उन्हीं की सरकार के मंत्री सरयू राय मैदान में ताल ठोक रहे हैं. ऐसे में सभी लोग कयासों की सियासत कर रहे हैं कि कौन सा जातीय समूह किनके साथ जाएगा. कोई कहता है कि बिहारी और सवर्ण वोट सरयू राय के साथ होंगे तो कोई डपट देता है कि आखिर लाख से अधिक बैकवर्ड वोटर रघुवर का साथ देंगे. कोई रघुवर सरकार के विकास की बात कर रहा है तो कोई सरयू के ईमानदारी के किस्से गा रहा है.     

ऐसे में पूरे झारखंड की जुबान पर एक ही सवाल है कि क्या मुख्यमंत्री रघुवर दास सियासी चक्रव्यूह में घिर रहे हैं ! सबकी जुबान पर अभी यही सवाल है. रघुवर सरकार में मंत्री रहे सरयू राय अपने अपमान से आहत होकर मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ ताल ठोंक चुके हैं. सरयू राय निर्दलीय उम्मीदवार होंगे, ऐसे में मुख्यमंत्री को घेरने की कोशिश में तत्पर झामुमो और आजसू ने सरयू को समर्थन देने में जरा भी देर नहीं की. अब सरयू राय मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं के बीच घूम घूम कर भ्रष्टाचार के तीखे सवालों से रघुवर के तमाम दावों की पोल खोलेंगे. रघुवर सरकार में मंत्री रहते सरयू राय ने पांच सालों में अपनी ही सरकार के कामकाज को लेकर जितनी चिट्ठियां लिखी, उन सबका जवाब मांगेंगे. 17 नवंबर को सरयू राय ने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, भाजपा ने भी देर नहीं की और जमशेदपुर पश्चिम से देवेन्द्र सिंह को उम्मीदवार घोषित कर दिया. ऐसे में झारखंड की सबसे हाई प्रोफाइल सीट पर अब सबकी नज़र है. हालांकि भाजपा के कई नेताओं का दावा है कि सरयू राय जो भी थे, वो भाजपा की वज़ह से थे. अब चाहे वो कुछ भी आरोप लगायें, सामूहिक जिम्मेवारी से भाग नहीं सकते. वैसे भी जमशेदपुर पूर्व की सीट पर रघुवर ने मजबूत किलेबंदी की है, उन्हें जनता का साथ मिला है और चुनाव दर चुनाव उनकी लोकप्रियता में इजाफा ही हुआ है,रघुवर दास को मिले वोट तो कम से कम यही बताते हैं.ऐसे में तमाम दावों के बीच सच्चाई तो यही है कि इस बार मुकाबला कड़ा जरुर है पर रघुवर की जीत पर किसी भाजपाई को संशय नहीं है. अब जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी यह साफ़ कर दिया है कि वो सरयू राय के प्रचार के लिए नहीं जायेंगे तो बिहारी वोटरों के एक बड़े चंक के सरयू से बिदकने के आसार बनाये जा रहे हैं.     

ऐसे में यह समझना जरुरी है कि आखिर बात यहां तक कैसे पहुंची कि सरयू कई दशक बाद भाजपा से बगावत कर बैठे. दरअसल इन पांच वर्षों में सरयू राय और रघुवर दास के बीच कई मामलों पर गंभीर मतभेद रहे. चारा घोटाला उजागर करनेवालों में सरयू राय भी थे और पूर्व मुख्य सचिव राजबाला वर्मा पर इस घोटाले में अपनी जिम्मेवारी नहीं निभाने का आरोप था, फिर बेटे की कंपनी के लिए एक निजी बैंक पर अनावश्यक धन मोचन का आरोप लगा. ऐसे में सरयू राय ने राजबाला को हटाने की मांग की, जिसे मुख्यमंत्री ने अनसुना कर दिया. आरोप है कि सत्ता  ने योग्य अफसर अमित खरे को मुख्य सचिव इसलिए नहीं बनाया, क्योंकि सरकार के कर्ता धर्ता को लगता था कि अमित खरे ही सरयू राय को सारे कागजात दे रहे थे. ऐसे कई आरोप थे, जिसे केवल सरयू राय ने ही उठाने की जुर्रत की और वह 5 सालों के लिए अपनी ही सरकार को घेरते रहे. मजाक में कई भाजपा नेता उन्हें डिफेक्टो नेता प्रतिपक्ष भी कहते थे. लेकिन ऐसा करके सरयू राय सत्ता के बड़े खिलाड़ियों की नज़र में चढ़ते रहे और टिकट नहीं देकर भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने सरयू राय को दंडित किया. संदेश यह भी देने की कोशिश की गयी कि पार्टी के अनुशासन की अपनी सीमा होती है और जो भी इसे तोड़ेगा उसे पार्टी दंडित करेगी. खुद भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह ने कहा कि सरयू राय और राधाकृष्ण किशोर ने लगातार दलीय अनुशासन को तोड़ा है. सरयू राय उसी सरकार की सार्वजनिक आलोचना करते रहे, जिसके वो अंग थे. अरुण सिंह ने कहा कि अगर सरयू या राधाकृष्ण किशोर को कोई बात कहनी थी तो उसे पार्टी फोरम पर कहते. पब्लिक में उसे ले जाकर इन लोगों ने गंभीर अनुशासनहीनताकी है, इसलिए इनका टिकट काटा गया.    

सरयू राय के निर्दलीय मैदान में डटने के बाद थोड़े समय के लिए सीएम के खेमे में अफरातफरी दिखी लेकिन एक सप्ताह के अंदर ही भाजपा संगठन ने बहुत हद तक नकारात्मकता को थाम लिया और रघुवर दास के चेहरे पर निश्चिंतता का भाव लौटा.

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