युवावस्था में पहुंचा झारखण्ड,19 सालों में देखे कई उतार-चढ़ाव

जल,जंगल और पहाड़ों से घिरा झारखण्ड अलग राज्य 2000 में हुआ था. आज यह प्रदेश युवावस्था में पहुँच गया. इस प्रदेश ने 19 सालों में कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव को देखा.झारखण्ड गठन के बाद से यहाँ पर कोई भी सरकार स्थिर नहीं रही.इससे प्रदेश का समुचित विकास नहीं हो पाया.हमेशा गठबंधन की सरकार यहां की जनता को देखना पड़ा.बीते 2014 के विधानसभा चुनाव में पहली बार जनता ने भाजपा को स्पष्ठ बहुमत दिया और रघुवर दास के नेतृत्व में सरकार बनी.लेकिन प्रदेश में बहुमत वाली सरकार गठन के बाद भी आज भी झारखण्ड का समुचित विकास नहीं हो पाया है. एकीकृत बिहार से नवंबर 2000 में अलग हुए इस प्रदेश ने पिछले 19 साल में 10 मुख्यमंत्रियों का शासनकाल देखा. इसके साथ ही इतने विधानसभा अध्यक्षों को भी देखा.नेताओं का बयानउन मुख्यमंत्रियों में अर्जुन मुंडा और शिबू सोरेन दो ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने अलग-अलग तीन तीन बार राज्य के मुखिया की कमान संभाली. बीजेपी के नेता और राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा तीन बार सीएम बने जबकि प्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल की सबसे लंबी पारी खेलने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा सुप्रीमो शिबू सोरेन के माथे 10 दिन के मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड है. इसके अलावा निर्दलीय मुख्यमंत्री बनने वाले मधु कोड़ा देश में तीसरे ऐसे शख्स के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने बिना किसी दल से जुड़े दो साल से अधिक शासन किया

अपने स्थापना के बाद से ही झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का दौर देखने को मिला. इस दौरान सरकारें आई और गई. उनमें सबसे ज्यादा चांदी दलबदलू विधायकों ने काटी. एक तरफ जहां निर्दलीय विधायकों ने तत्कालीन बीजेपी सरकार का समर्थन कर अपना लोहा मनवाया. वहीं दूसरी तरफ अलग-अलग दलों से जीतकर विधानसभा पहुंचे, विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम कर पूरे देश में चर्चा का माहौल पैदा कर दिया. इसका सबसे ज्यादा असर झारखंड विकास मोर्चा में देखने को मिला जहां 2009 विधानसभा चुनाव के बाद और फिर 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद बड़ी संख्या में विधायकों ने पाला बदला. 2014 में जेवीएम के 6 विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया.मिला प्रशिक्षण फिर भी टूटी संसदीय मर्यादा

अपने स्थापना के बाद से ही झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का दौर देखने को मिला. इस दौरान सरकारें आई और गई. उनमें सबसे ज्यादा चांदी दलबदलू विधायकों ने काटी. एक तरफ जहां निर्दलीय विधायकों ने तत्कालीन बीजेपी सरकार का समर्थन कर अपना लोहा मनवाया. वहीं दूसरी तरफ अलग-अलग दलों से जीतकर विधानसभा पहुंचे, विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम कर पूरे देश में चर्चा का माहौल पैदा कर दिया. इसका सबसे ज्यादा असर झारखंड विकास मोर्चा में देखने को मिला जहां 2009 विधानसभा चुनाव के बाद और फिर 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद बड़ी संख्या में विधायकों ने पाला बदला. 2014 में जेवीएम के 6 विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया.मिला प्रशिक्षण फिर भी टूटी संसदीय मर्यादा

हालांकि, 19 साल में पहली बार 2014 में बनी बीजेपी सरकार ने नए विधायकों के लिए बाकायदा प्रशिक्षण कार्यक्रम बुलाया गया. इस कार्यक्रम में लोकसभा के अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने विधायकों को चरित्र और संसदीय मर्यादा का पाठ पढ़ाया लेकिन सबसे ज्यादा इसी दौरान संसदीय मर्यादा तार-तार हुईं. झारखंड के संसदीय इतिहास में पहली बार विधानसभा अध्यक्ष के ऊपर जूते फेंके गए और सदन के मुखिया ने कथित तौर पर अपशब्द का प्रयोग किया गया.मिला अपना विधानसभा भवन

19 साल के झारखंड में कुछ ऐसी भी चीजें देखने को मिली जिसकी वजह से पूरे देश में इसका नाम पॉजिटिव सेंस में लिया जाएगा. उनमें सबसे पहला झारखंड विधानसभा का भवन है जो अपने आप में अनूठा है. मौजूदा 81 सदस्य विधानसभा भवन में डेढ़ सौ से अधिक विधायकों को एकोमोडेट किया जा सकता है. इसके साथ ही यहां बैठने के लिए मंत्रियों, सभापति, नेता प्रतिपक्ष और मुख्यमंत्री के लिए अलग-अलग बकायदा चेंबर बने हुए. इसके अलावा विधानसभा के पास ही सचिवालय का भी शिलान्यास किया गया.

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