महामहिम को तो दलित और सवर्ण में मत बांटो!

देवेंद्र गौतम

भाजपा ने बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया। इसके जरिए भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे। लेकिन अपने सवर्ण मतदाताओं को असमंजस में भी डाल दिया। श्री कोविंद के अबतक के कामकाज, योग्यता और उपलब्धियों की चर्चा की जगह उनका दक्षिण भारतीय और दलित समुदाय से होना चर्चा का विषय बना। विपक्षी दलों के दलित जनाधार में सेंध लगाने की बात हुई। इस क्रम में भाजपा ने गौर नहीं किया कि नब्बे के दशक के बाद पूरी तरह भाजपा से जुड़ जाने वाले सवर्ण मतदाताओं के समक्ष इससे क्या संदेश जाएगा।

उस दौर में दलित और पिछड़ावाद के उभार के बाद सवर्ण मतदाताओं ने भाजपा को अपने हितों की संरक्षक पार्टी मान लिया था। लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद जब मोदी ने स्वयं के पिछड़ी जाति से आने की बात सार्वजनिक रूप से कही और पिछड़ी जातियों तथा दलितों को लुभाने के प्रयास शुरू किए तो एक संदेश गया कि वे विपक्षी दलों के जनाधार में सेंध लगाने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन अब सवर्ण मतदाताओं के समक्ष यह संदेश जा रहा है कि मोदी दलित-पिछड़ा तुष्टीकरण की नीति अपना चुके हैं। सवर्ण मतदाताओं के हित अब उनकी प्राथमिकता में नहीं हैं। यह तबका संख्याबल के आधार पर किसी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने की स्थिति में नहीं है। लेकिन पढ़ा-लिखा और जागरुक तबका है। हवा बनाने और बिगाड़ने का काम यह तबका बखूबी करता रहा है। इसे किसी तबके से वैमनस्य नहीं है लेकिन अपने हितों के प्रति यह तबका सचेत रहा है। अन्य जातियों के साथ तालमेल से समीकरण बने लेकिन इसके हितों को नजर-अंदाज न किया जाए, यही इसकी कामना रहती है। लेकिन फिलहाल जो स्थिति बन रही है उसमें सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच दलित और पिछड़े मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की रस्साकशी चल रही है। इस क्रम में सवर्णों के हित हाशिए में डाले जा रहे हैं। इस स्थिति में उन्हें एक नए घर की तलाश करने पर विचार करना होगा। वह घर कौन सा होगा, फिलहाल स्पष्ट नहीं है।

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