भूमिहार-ब्राह्मण जिधर, बिहार का मिजाज उधर

प्रणव/ चंद्रमोहन : बिहार की राजनीति की जटिलता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि यहां मोदी और राहुल दोनों ही क्षेत्रीय क्षत्रपों के पीछे चलने को बाध्य हैं। आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि हिंदी हार्ट लैंड में बिहार इकलौता ऐसा राज्य है, जहां जीता का फार्मूला तलाशना बेहद चुनौतीपूर्ण है। पिछलग्गूपन के दाग को जब भी भाजपा या कांग्रेस ने हटाने की कोशिश की तो सत्ता हाथ से फिसल गई। खासकर, मंडल-कमंडल के बाद के राजनीतिक हालात के बीच दोनों ही दल लालू और नीतीश के पीछे चलते रहे हैं। कांग्रेस ने तो कभी साहस ही नहीं किया, लेकिन मोदी-मैजिक के दौर में 2015 में भाजपा ने हिमाकत की थी। तब नीतीश-लालू साथ थे। नतीजा सामने था- मोदी-मैजिक बिहार में फेल हो गया। ऐसे में एकबार और यह साफ हो गया कि बिहार में जातिगत राजनीति के आगे धार्मिक-राजनीति का आधार कहीं भी नहीं टिकता है। फिर, यह सोचा गया कि क्यों न जाति-धर्म को मिला कर एक नया जीत का फार्मूला तय हो।
संभव है कि इसबार बिहार में जीत का फार्मूला यही कॉकटेल तय करे। पर, यहां भी पहले जाति का आधार होगा, जिस पर धर्म का मुलम्मा चढ़ा दिया जाएगा। इस मसले को लेकर कश्मकश तो भाजपा और जदयू के बीच भी होगा, क्योंकि नेतृत्व खो चुकी भाजपा यह कोशिश करेगी कि नीतीश कुमार वोटर्स के धार्मिक आधार को प्राथमिकता दें और उस पर जाति का चेहरा लगा दें। दूसरी ओर, यह संघर्ष कांग्रेस और राजद की बीच भी होगा। लालू प्रसाद चाहेंगे कि जाति के ऊपर धर्म का चेहरा किसी भी सूरत में न लगने पाए। दूसरी ओर, कांग्रेस चाहेगी कि जाति पर धर्म का मुलम्मा लगाने के लिए राजद हामी भर दे। यह ज्योंहि तय हो जाएगा, उसके साथ ही राजग या यूपीए के लिए जीत का फार्मूला भी निकल जाएगा। 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद से लगातार बिहार में बगैर चुनाव के सत्ता की दहलीज तक पहुंचने का रास्ता बदलता रहा है। अंतिम बार इसे नीतीश कुमार ने बदला, जिसकी बदौलत भाजपा को सत्ता का सुख फिर से मिल गया। अब इस मामले में लिटमस टेस्ट का मौका आ गया है। नीतीश को यह एकबार फिर से साबित करना होगा कि वे एकसाथ भाजपा और राजद दोनों को ही परास्त कर सकते हैं। वह भी विकास को केंद्र में रख कर। क्योंकि, हाल में जिस तेजी से केंद्र की मोदी सरकार ने मुद्दों को विपक्ष के हाथों से छीना है, उससे नीतीश की राह आसान होती दिख रही है। मोदी के लाख लहर पैदा करने की कोशिशों के बाद भी वह बात नहीं दिख रही है, जो 2014 में थी। हां, यह जरूर हुआ है कि उऩ्होंने नाराजगी को कम करने की कोशिश की है। पर, जीत का अचूक फार्मूला अबतक किसी के पास नहीं आ सका है। इसी के तहत भूमिहार-ब्राह्मणों का एका भाजपा के ललाट पर रेखाएं खींच रहा है।
दोनों ही गठबंधनों के पास इस बात की चुनौती है कि वह जातिगत वोटों को किस तरह से अपने साथ जोड़े रख सक पाता है। इस बार के चुनाव में यह तय लग रहा है कि भूमिहार-ब्राह्मण वोटर्स का मूड बदल गया है। रणनीतिकार इसे ‘बीबी’ के नाम से पुकार रहे हैं। इसमें भी भूमिहार तो मुखर है, लेकिन ब्राह्मण खामोश है। नेताओँ को इस बात की आशंका है कि यदि भूमिहार के पीछे ब्राह्मण भी गोलबंद हो गए तो राजग का खेल खत्म हो सकता है। यह भी सही है कि अबतक यह समीकरण पूरी मजबूती के साथ भाजपा के साथ रहा है। बिहार भाजपा के भीष्म पितामह मानेजाने वाले कैलाशपति मिश्र ने इस समीकरण को साधा था और उसे धीरे-धीरे कांग्रेस से तोड़ा था। सहज तौर पर लालू का विरोध करनेवाले भूमिहारों ने उनको धूल चटाने तक भाजपा और नीतीश कुमार का साथ दिया। बाद में यह तबका धीरे-धीरे दूर होने लगा। अंदरुनी तौर पर यह कहा जाने लगा कि अमित शाह के अध्यक्ष बनने के बाद से ही बिहार में भूमिहार नेता और कार्यकर्ता उपेक्षित होने लगे। नीतीश और भाजपा ने इस मामले में बेहद चतुराई से काम लिया। चेहरों को बचाए रखा, लेकिन समर्थकों को उनसे दूर कर दिया। सरकारी ठेकों से दूर किये जाने पर भी यह तबका रंज था कि उसी दौर में एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ मोदी सरकार ने अध्यादेश ला दिया। दबा हुआ विरोध सड़कों पर आ गया। यह सब चल ही रहा था कि दूसरी ओर, तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत हो गई। कांग्रेस बिहार में सत्ता का सूत्र खोज रही थी तो दूसरी ओर भूमिहार-ब्राह्मण एक नई पार्टी, जो उऩको तवज्जो दे सके। मान-सम्मान दे सके। कांग्रेस ने इस मौके को लपका और उनको अपने साथ जोड़ने की कोशिश करने लगी। प्रदेश अध्यक्ष पद पर अरसे बाद ब्राह्मण की ताजपोशी ने यह साफ कर दिया कि बिहार में कांग्रेस सत्ता के संकेतों को समझ रही है और सूत्रधारों की तलाश भी कर रही है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि 29 साल बाद जब बिहार में कांग्रेस की अगुवाई में रैली हुई तो भूमिहार तबके ने उसमें बढ़-चढ़ कर भाग लिया। सारी व्यवस्था की और भीड़ भी जुटाई। गौर करनेवाली बात तो यह रही कि जो भूमिहार नेता जदयू और भाजपा में हैं, वे भी सामने तो नहीं आए, लेकिन अपने समर्थकों को रोकने में नाकामयाब रहे। या रोकने की इच्छा नहीं दिखाई।
आंकड़ों-अनुमान के मुताबिक राज्य में भूमिहार लगभग छह फीसदी हैं। ब्राह्मणों का अनुपात लगभग पांच फीसदी के आसपास है। दोनों मिल कर दस फिसदी हो जाता है। यह वोट जिस भी गठबंधन के पास जाएगा, वह विजय-पथ पर अग्रसर हो सकता है। पर, यहां भी एक पेंच है। जहां-जहां कांग्रेस का उम्मीदवार चुनाव लड़ेगा, वहां तो यह पूरी तरह से महागठबंधन के साथ जा सकता है। पर, जहां राजद का प्रत्य़ाशी होगा, वहां वह नोटा को प्राथमिकता दे सकता है। भाजपा, जदयू और लोजपा जहां-जहां भूमिहारों या ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाएगी, वहां हो सकता है कि नोटा के बदले वह इऩको वोटिंग का विकल्प अपना ले। मतलब यह कि वह पूरी तरह से जातिगत होकर वोट करने का मूड बना सकता है। यह मूड ही सभी के लिये चिंता का विषय बन सकता है। इसमें भी सबसे ज्यादा नाराजगी भाजपा से है। क्योंकि, नीतीश जब इस समुदाय को सत्ता में कम भागीदारी देते हैं तो अन्य तरह के लाभ देकर बैलेंस करते हैं। दूसरी ओर, भाजपा में ऐसा नहीं हो पा रहा है। उन्हें न तो केंद्र की राजनीति में सत्ता का भरपूर सुख मिल पा रहा है और न अन्य दूसरी जगहों पर। ले-देकर एक गिरिराज सिंह इकलौते हैं,उनकी भी हालत कोई बहुत मजबूत नहीं है। इस तबके को तो इस बात से अधिक हैरानी हुई कि बिहार में 2015 में विधानसभा का चुनाव हारने के बाद भी भाजपा ने भूमिहारों को हाशिये पर रखा। ब्राह्मणों की हालत भी इसी तरह की है। आजादी के बाद से ही बिहार की राजनीति में दो ही जाति समूह का वर्चस्व रहा है। तब कांग्रेस में भूमिहार और राजपूत के बीच सत्ता का संघर्ष चलता रहता था। दूसरी ओर, त्रिवेणी संघ की जातियां (कुर्मी, कुशवाहा और यादव) थीं। उसमें भी सीएम की कुर्सी पर भूमिहार श्रीकृष्ण सिंह ही रहते थे और अनुग्रह नारायण सिंह (राजपूत) दूसरे नंबर पर। उसके बाद के दौर में राजो सिंह, रामाश्रय प्रसाद सिंह, ललितेश्वर प्रसाद शाही, रघुनाथ पांडेय और भोला सिंह सरीखों का वर्चस्व कांग्रेस में रहा था। मंडल के दौर में जब त्रिवेणी संघ की जातियों में यादवों के हाथ सत्ता चली गई और लालू प्रसाद सीएम बने तब जाकर भूमिहार कांग्रेस से दूर होने लगे थे। सवर्ण जातियों में अन्य तीन जातियां तो मौके-बेमौके लालू के साथ होती रहीं, लेकिन भूमिहार कभी भी उऩके साथ नहीं गए। तब भूमिहारों ने भाजपा को अपनाया और भाजपा ने भी उनको। बिहार भाजपा में तब कैलाशपति मिश्र की चलती थी। उन्होंने एक के बाद एक नेतृत्व पैदा किया और उनको राजनीति में स्थापित भी किया। एक वाकये ने भूमिहारों को और भी अधिक हैरान किया। 2015 के विधानसभा चुनाव में कैलाशपति मिश्र की बहू ने जब रोते-रोते यह कहा कि प्रदेश भाजपा के किन-किन नेताओं ने उऩके साथ क्या-क्या किया और किस तरह से उपेक्षा की। एक अदद टिकट तक से दूर कर दिया तो मीडिया के कैमरों ने उसे खूब चलाया भी। तब कथित तौर पर गोदी-मीडिया तो नहीं था, लेकिन नीतीश-मीडिया जरूर था। इस तबके को तब यह लग गया कि उसके लिए अब भाजपा में उनके लिये दुर्दिन दूर नहीं है।
भूमिहार और ब्राह्मणों की वोट प्रतिशत यदि 10 भी मान लिया जाए तो यह काफी अहम हो जाता है। क्योंकि, राजद का वोट बैंक मुस्लिम और यादवों से जुड़ा हुआ है। दोनों मिल कर लगभग 30 फीसदी हो जाता है। यहां किसी भी अन्य दल के लिये सेंधमारी मुश्किल है। क्योंकि, कांग्रेस भी राजद के साथ है। महादलित वोटर्स की संख्या लगभग 14-15 फीसदी है। यह विभाजित होगा। क्योंकि, उसके सामने रामविलास पासवान, भाजपा के प्रेम कुमार और हम के जीतन राम मांझी होंगे। मगध इलाके में मांझी की काट प्रेम कुमार होंगे तो शेष बिहार में पासवान महादलित वोटों पर हावी रहेंगे। ओबीसी का भी यही हाल होने जा रहा है। फायदे में राजग रह सकता है। सबसे ज्यादा बिखराव ओबीसी वोटों में होगा। यह दोनों ही खेमों में बंट जाएगा। मोटे तौर पर यह अनुमान है कि जहां राजग के पास 34-35 फीसदी वोट जा सकता है। दूसरी ओर, यूपीए के पास यादव और मुस्लिम मिल कर ही 29 फीसदी वोट का आंकड़ा पहुंच रहा है। यदि इसमें भूमिहार और ब्राह्मणों के दस फीसदी वोट को जोड़ दिया जाता है तो यह आंकड़ा 39 फीसदी पहुंच जाएगा। बिखराव दोनों ही ओर होने जा रहा है, कम या ज्यादा। पर, जिस तरह से बिखराव के बाद भी यादव और मुस्लिम वोटर सबसे ज्यादा राजद के पास है, उसी तरह अन्य जातियां भी कम-ज्यादा बिखराव के साथ एनडीए के साथ रह सकती हैं। ऐसे में भूमिहारों-ब्राह्मणों का दो-तीन फीसदी बिखराव यदि होता है और वह सात फीसदी भी कांग्रेस के साथ आ जाता है तो बाजी एनडीए के लिये काफी मुश्किल-भरी हो सकती है।
यह सब आंकड़ा यादवलैंड- मधेपुरा, भूमिहार लैंड- नवादा, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर और मुस्लिम लैंड- किशनगंज में अपवाद हो सकता है। क्योंकि, इऩ सीटों का इतिहास रहा है कि वहां का वोटर जाति आधारित वोटिंग को पसंद करता है, न कि मुद्दा आधारित। यदि दोनों का ही मेल हो गाया तो और भी अच्छा। यह सही है कि सवर्ण आरक्षण देकर इसे संतुष्ट करने की कोशिश की गई है। ब्राह्मणों को कुछ हद तक संतुष्ट या मनाया जा सकता है, क्योंकि उऩकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा सीमित ही रहती आई है। दूसरी ओर, भूमिहार तभी संतुष्ट हो सकेंगे, जब उनको सत्ता के साथ-साथ अन्य तरह के आर्थिक लाभ, सरकारी योजनाओँ में ठेकेदारी भी मिले। 2014 के चुनाव में मोदी को वोट देने के बाद यह तबका इन्ही वजहों से 2019 में उऩका विरोध करने पर अड़ा हुआ है। दिवंगत भोला सिंह के प्रति किये गये व्यवहार, सीपी ठाकुर का एकांतवास-वनवास, कैलाशपति मिश्र के परिवार के प्रति उपेक्षा का भाव और उससे भी ज्यादा अमित शाह का सुशील मोदी प्रेम सरीखे मसलों ने भूमिहारों को अपने भविष्य के प्रति सशंकित कर दिया है। अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीति से दूर जाने के बाद ब्राह्मणों का एक तबका भी थोड़ा निराश हुआ। पर, वह भी बिहार की राजनीति में लालू-नीतीश के उपेक्षापूर्ण व्यवहार के बाद भाजपा में भी उसी तरह के हालात को देख कर भूमिहारों के साथ होने का मन बना रहा है। दोनों जातियों के नेता अपने समूहों को यह समझाने में लगातार जुटे हुए हैं कि साथ आने में ही भविष्य सुरक्षित है। एनडीए के लिये यही चिंता का विषय़ है।
खैर, यह अबतक के अनुमान हैं, संकेत हैं। अभी कई चरण शेष हैं। उम्मीदवारों का चयन, बागियों की भूमिका, दागियों का उतावलापन, नेताओं के तात्कालिक बोल- आदि भी अहम भूमिका निभाएँगे। जैसे-जैसे चुनाव की गाड़ी बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे यह तय होता जाएगा कि किसका क्या रूख रहता है। इसमें सबसे ज्यादा दबाव भाजपा पर है, क्योंकि दोनों ही उसके पुराने वोटर रहे हैं। चुनाव के आखिरी वक्त में किसी को संतुष्ट करना आसान नहीं होता है। यह भी सही है कि अभीतक भूमिहारों में जो बाहुबली हैं, वे ही विरोध में सामने आ रहे हैं। जो इंटेलेक्चुअल हैं, उऩ्होंने अभीतक चुप्पी साध रखी है। यह भी सूचना है कि यह भाजपा में सर्वाधिक विरोध सुशील मोदी का है, जो धीरे-धीरे भूमिहारों को हाशिये पर ले जा रहे हैं। दबाव में यदि भाजपा आ गई, तो सुशील मोदी के पर कतरे जा सकते हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस इस बात से खुश है कि उसका परंपरागत वोटर लौट रहा है। इससे लालू खेमे में भी बेचैनी है और नीतीश खेमे में भी।

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