पॉलिटिक्स का टी 20 का मैच चल रहा है क्या !

राघवेंद्र

पॉलिटिक्स का टी 20 का मैच चल रहा है क्या !

सियासत हो या जीवन का कोई और पक्ष, सियासत हो या जीवन का कोई और कुम्भ. है तो यह यात्रा ही ना. एक लंबी यात्रा…जिसमें सभी को अपनी-अपनी पारी खेलनी होती है. राजनीति वैसे भी इन दिनों टी 20 के मैच की तरह हो चुकी है.जिसमें फटाफट रोमांच का ओवरडोज शामिल कर दिया गया है. वैसे भी जब चुनाव सामने हों तो सियासी खेल का रोमांच कुछ ज्यादा हो ही जाता है. अब कुछ दिनों की देश की सियासत को देख लीजिये. लग रहा है किसी एक्शन फिल्म का क्लाइमेक्स फिल्माया जा रहा हो . बंगाल में धरने पर सीएम बैठी हैं,बंगाल में मुख्यमंत्री धरने पर बैठ गयी तो लखनऊ में प्रियंका का ऐसा भव्य शक्तिप्रदर्शन हुआ जैसे कांग्रेस ने यूपी की सारी सीटें जीत ली हों. आंध्र के मुख्यमंत्री दिल्ली में धरना पर बैठ गए तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को हवाई अड्डे पर हिरासत में ले लिया गया. कोई चौकीदार चोर के नारे लगा रहा है. तो कोई महा मिलावट की राजनीति का मर्सिया पढ़ रहा है. कोई किसी नेता के बेटे पर फिकरे कस रहा है तो कोई किसी का मेरिटल स्टैट्स पूछ रहन है. इसलिए अब इस बात पर मगजमारी करने का कोई मतलब नहीं कि देश का कौन सा पद अपने सम्मान की ढिबरी बचा पा रहा है.

संसद में प्रधानमंत्री अपने आखिरी भाषण में कहते हैं कि कांग्रेसियों को डराने के लिए ही जनता ने उन्हें चुना है. वहीँ कांग्रेस अध्यक्ष कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री देशद्रोही हैं. सभी नई शब्दावलियों से भरी गालियों वाले समाजशास्त्री बन गए हैं. ऐसे में आखिर किस पर भरोसा करें ! किसकी सुनें और किसकी नहीं! सभी नए दौर के चाणक्य हैं. जिन्हें अपने को छोड़कर सभी गलत लगते हैं.

ऐसे में देश राजनीति के सितारों की व्यक्तिगत लड़ाई का रंगमंच बन गया है. मुद्दे गौण हैं. अपनी बात कहने की आपाधापी है. निष्कर्ष निकालने की जल्दीबाजी है. ना विकराल होती बेरोजगारी की बात हो रही है और ना ही किसानों के असली समस्याओं की. आम लोगों की समस्याओं की बात कोई नहीं करता. सब वही बात कर रहे हैं, किसी को फ़िक्र नहीं है. वही मुद्दे उठाये जा रहे हैं जिनसे किसी को वोट की उम्मीद है. या तो वोटर्स को डराया जा रहा है या उन्हें बरगलाया जा रहा है.

आखिर नेता कर क्या रहे हैं ! वो तो सियासी अभिनय कर रहे हैं लेकिन जमीन पर आम लोग उनके अभिनय को सच समझ कर आपस में भिड रहे हैं. किस्से कहानियों के जरिये सबके झूठ जनता के सामने ऐसे परोसे जा रहे हैं कि यही सबको सच लगे. जाति और धर्म के शर्बत ने अपना अपना घोसला बना लिया है.

अब बात बिहार और झारखंड की. बिहार के कोसी इलाके में लगातार मुख्यमंत्री यात्राएं कर रहे हैं. अपने कार्यक्रमों के जरिये वो कोसी और मिथिलांचल तथा सीमांचल के इलाकों में जदयू की सियासी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं. लेकिन मधेपुरा के पुरैनी में सामाजिक कार्यकर्ता टाइगर झा कहते हैं कि शरद यादव यहां लोकल लेवल पर नीतीश कुमार की हवा निकाल देंगे. पप्पू यादव मधेपुरा के एमपी हैं. क्षेत्र में लोकप्रिय भी हैं. राजद का भी अपना जनाधार है. विकास की बड़ी बड़ी बातें कही जाती हैं लेकिन मधेपुरा जिला मुख्यालय से पुरैनी प्रखंड की जर्जर सड़क को देखकर विकास का सारा भ्रम टूट जाता है. कुछ समय पहले बिहार के मुख्य न्यायाधीश उदाकिशुनगंज आये थेरोड की विकराल स्थिति देखकर उन्होंने इसपर केवल टिप्पणी ही नहीं की बल्कि इसे सुनवाई की लिस्ट में डाल लिया. यह तो हाल है कि मुख्य न्यायाधीश को रोड पर कोग्निजंस लेना पड़ा. जिनसे पूछिए वही नीतीश सरकार को कोस रहा है.यह विकास का कौन सा मॉडल है. एक तरफ उजाला और अन्य जगहों पर अँधेरा.  

बिहार में नालंदा मॉडल चर्चा में है. चर्चा में तो तेज़स्वी यादव का बंगला भी है. लड़ाई कितनी व्यक्तिगत है कि बंगला खाली नहीं करने के लिए राजद के राजकुमार को सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा . सुप्रीम कोर्ट ने नाराज होकर 50 हजार का जुरमाना भी लगाया इनपर.

तेज़स्वी की हार और नीतीश कुमार की जीत के तौर पर भी देख सकते हैं,  यह व्यक्तिगत लड़ाई है. दो अलग अलग महत्वकांक्षाओं का टकराव. सरकार आखिर तेज़स्वी यादव का बंगला खाली कराने पर क्यों आमादा रही! इससे जनता का कौन सा भला या नुकसान हो गया. ये हठधर्मिता आखिर क्यों ! ऐसे ही वजहों से बिहार में अब पोलिटिकल हारमनी नहीं दिखती. मतभेद मनभेद में बदल चुके हैं.

वैसे मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के नरक की भी इस सप्ताह खूब चर्चा रही. नीतीश सरकार की विफलता के सबसे बड़े उदाहरण के तौर पर इसे देखा गया. इस काण्ड की सीबीआई जांच शीर्ष कोर्ट की निगरानी में हो रही है . इसी जांच के अधिकारी को बदलने के लिए जांच एजेंसी के पूर्व अंतरिम निदेशक नागेश्वर राव को कोर्ट ने सज़ा दी. जब भी यह मामला कोर्ट में आता है, पूरा बिहार शर्मसार हो उठता है . किसकी चूक है यह,अंतरिम निदेशक को कोर्ट ने दंडित किया . लेकिन नीतीश सरकार  ने आगे ऐसी घटनाओं को रोकने की भी कोई कोशिश नहीं की है.

बिहार में लोकसभा चुनावों की तैयारी जोरों पर है. एनडीए ने सीटें आपस में बांट ली है लेकिन महागठबंधन में जबरदस्त तकरार दिख रही है. कांग्रेस और राजद के बीच जोर आजमाइश चलरहा है .

राजद का जनाधार ही महागठबंधन की पूंजी है. उपेन्द्र कुशवाहा और शरद यादव जैसे नेता या जीतनराम मांझी कैसे एडजस्ट किये जायेंगे ! किसे कौन सी सीट मिलेगी ! इसपर अभी जिच कायम है .

रस्साकसी तो झारखंड में भी चल रही है. यहां भी महागठबंधन को मौसमी बुखार लगा हुआ है.झाविमो को कमतर आंक रही कांग्रेस के लिए विकत परिस्थिति है . गोड्डा सीट झाविमो को हर हाल में चाहिए नहीं तो प्रदीप यादव वहां से लड़ेंगे ही और फिर भाजपा की राह आसान हो जाएगी .महागठबंधन की इस हालत पर भाजपा खुश है. लेकिन खुद भाजपा की हालत जमीन पर अच्छी नहीं है . कार्यकर्ताओं की लगातार उपेक्षा और गुटबाजी की वज़ह से जमीन पर हालत ठीक नहीं है. मुख्यमंत्री की अलोकप्रियता एक अलग ही वज़ह है .

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