पांकी सीट पर कब्जे के लिए अभी से तेज हुआ सियासी दांव पेंच

-भाजपा के लिए अजेय बना यह दुर्ग

झारखंड में रघुवर दास के नेतृत्व में एनडीए की सरकार ने दो साल से ज्यादा का कार्यकाल पूरा कर लिया है. राज्य में पिछले 14 सालों में पहली बार बहुमत की सरकार बनी है. केंद्र में भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार है. बहरहाल, झारखंड में पिछले दो सालों में हुए उप चुनावों में रघुवर सरकार या नरेंद्र मोदी का जादू नहीं चल पाया है. हाल ही में लिट्टीपाड़ा में हुए चुनाव में झामुमो उम्मीदवार साइमन मरांडी ने अपने निकटतम विरोधी भाजपा उम्मीदवार हेमलाल मुर्मू को 12, 900 वोटों के बड़े अंतर से हरा दिया. पर अगर बात करें पलामू प्रमंडल की तो झारखंड में राजनीतिक रूप से परिपक्व इस इलाके में भाजपा ने जोड़-तोड़ के फार्मूले से भले ही सियासी गणित अपने पक्ष में कर ली है. लेकिन विधानसभा चुनावों में अबतक कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं की है. वहीं पांकी विधान सभा क्षेत्र की बात की जाय तो भाजपा इस सीट पर आजतक अपना खाता नहीं खोल पायी है.
पिछले वर्ष हुए पांकी विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के देवेंद्र कुमार सिंह ने 3558 मतों से जीत हासिल की थी. देवेंद्र को कुल 56299 वोट मिले थे जबकि दूसरे स्थान पर रहे शशि भूषण मेहता. मे‍हता को कुल 52999 वोट मिले हैं. वहीं तीसरे स्थान पर भारतीय जनता पार्टी के लाल सूरज रहे. सूरज को 36163 वोट मिले.
गौरतलब है कि 2014 के विधान सभा चुनाव में भाजपा ने अमित तिवारी को मैदान में उतारा था. वह साढ़े 29 हजार वोटों से पीछे रह गये थे. वहीं दूसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी शशिभूषण मेहता रहे थे. इस सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार विदेश सिंह ने कब्जा किया था. पांकी विधान सभा में पिछले 10 वर्षों में हुए चुनावी समीकरण पर गौर करें तो एक बात जो सामने निकल कर आती है वह इस तथ्य को स्पष्ट करती है कि इस क्षेत्र में पिछले एक दशक में निर्दलीय उम्मीदवारों का ही बोलबाला रहा है. विदेश सिंह हों या शशि भूषण मेहता. विदेश सिंह ने भी जदयू प्रत्याशी मधु सिंह को 2000 के विस चुनाव में पहली बार मात्र 26 वोटों से पराजित किया था. जो काफी चर्चित हुआ हांलाकि मधु सिंह झारखंड राज्य बनने के बाद जदयू कोटे से मंत्री भी बने. बाद में विदेश सिंह को झारखंड हाईकोर्ट ने निर्वाचित घोषित किया. इसके बाद विदेश सिंह लगातार तीन बार इस सीट से चुनाव जीतते रहे.
राजनीतिक विश्लेषक इसके पीछे जातीय समीकरण को मुख्य कारण मानते हैं. उनका मानना है कि पांकी विस क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 25 हजार है. वहीं सवर्ण जातियों में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या भी इसके ही आसपास है. ये दोनों समुदाय हमेशा विदेश सिंह के साथ रहे. जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंदी शशि भूषण मेहता पिछड़ों की राजनीति करते आये हैं और धीरे-धीरे ही सही पर इस वर्ग के मतदाता भी उनके साथ खड़े दिखायी दे रहे हैं. यही वजह है कि विदेश सिंह को पिछले दो चुनावों में श्री मेहता ने कड़ी टक्कर दी है.
2014 के विस चुनाव में जहां विदेश सिंह अपने निकटतम प्रतिद्वंदी शशि भूषण मेहता से मात्र 1995 मतों से जीत दर्ज की थी. वहीं 2015 में हुए उपचुनाव में शशि भूषण मेहता मात्र 3558 मतों से पीछे रहे. जानकारों की मानें तो शशि भूषण मेहता पांकी विस क्षेत्र के समीकरण के भलिभांति समझते हैं इसीलिए पिछले चुनाव से अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए उन्होंने मतदाताओं के बीच पैठ बनाना शुरू कर दिया है. इसका लाभ उन्हें इस चुनाव में स्पष्टतौर पर मिला जबकि हालात उनके ठीक विपरीत थे.
विदेश सिंह के आकस्मिक निधन के बाद सहानुभूति उनके बेटे और कांग्रेस प्रत्याशी देवेंद्र सिंह के साथ थी. वहीं भाजपा प्रत्याशी लाल सूरज के लिए राज्य के सभी बड़े नेता, मंत्री क्षेत्र में मौजूद थे. इसके बावजूद शशि भूषण मेहता ने न सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज करायी बल्कि जीत के बेहद करीब पहुंच गये. इससे यह अंदाज लगाना बेहद स्वाभाविक है कि आगामी 2019 में होने वाले विधानसभा चुनाव में स्थिति क्या होगी.

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