पलामू में भाजपा की बदली फिजां

- बगैर नामधारी जमीन तलाश रही पार्टी

जिस समय भाजपा की पूरी टीम पलामू के मेदिनीनगर में मिशन 2019 में 60 प्लस की टारगेट पर गहन चिंतन कर रही थी. ठीक उसी वक्त पलामूवासियों के जेहन में इसी क्षेत्र के कद्दावर नेता इंदर सिंह नामधारी की याद आ रही थी. वैसे तो भाजपा धीरे-धीरे इस इलाके के साथ ही झारखंड में काफी मजबूत स्थिति में है. पर दो दशक पीछे जाइये, जब भाजपा को अटल-आडवाणी के नाम से जाना जाता था. तब इंदर सिंह नामधारी भाजपा के पूरे बिहार में झंडाबरदार हुआ करते थे. वे अस्सी के दशक में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे. और पूरे विपक्ष पर अकेले भारी पड़ते थे. हर रोज उनके बयान अखबारों की खास सुर्खियां बनती थी. भगवा ब्रिगेड की कमान संभाले नामधारी ने कांग्रेसी नेताओं के बीच अपने संघर्ष से अलग पहचान बनाई और बिहार के भाजपा के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे. अपने बेबाक अंदाज और जूझारू छवि के बदौलत वे एक मात्र नेता थे जिनके भाषण का मुरीद समूचा विपक्ष भी था. कहा जा सकता है कि कुछ बातों में उनमें और अटल बिहारी वाजपेयी में समानता थी. सिख समुदाय से होकर भी झारखंड के सबसे पिछड़े इलाके की प्रतिनिधित्व की और लोकसभा के उपसभापति तक का सफर तय किया. ये उनके विजन और प्रभावी छवि का ही असर था कि वे चतरा से निर्दलीय सांसद बने. लेकिन ऐसा क्या हुआ कि नामधारी आज झारखंड की राजनैतिक मंच से गायब हैं. राजनीतिक पंडितों की मानें तो वे अपनी महत्वाकांक्षा के शिकार हो गये. 2002 में डोमिसाइल नीति को लेकर हो रहे आंदोलन के बीच जब वे जदयू कोटे से झारखंड विधान सभा के अध्यक्ष थे उन्होंने राजनीति में सबसे बड़ी नैतिक भूल की, जिससे एनडीए की सरकार का पतन हुआ, बाबूलाल सरकार को गिराने में उनकी भूमिका भी उजागर हुई. इसे उन्होंने स्वीकार भी किया कि उनके पूरे राजनैतिक कैरियर पर उस प्रकरण से धब्बा लगा. पर उसके बाद जब वे भाजपा की मदद से निर्दलीय सांसद चुने गये तो लगा की वो दाग धुल गये हैं. लेकिन उसके बाद झारखंड की राजनीति में काफी प्रयोग हुए और इन सब के बीच एक साथ कई नई पीढ़ी के नेताओं का उदय हुआ. और नामधारी के युग का धीरे-धीरे पटाक्षेप हो गया. कहने को तो झारखंड की राजनीति में भाजपा के कई सितारे हैं लेकिन इनमें से कोई इंदर सिंह नामधारी जैसा चमक पायेगा ये अभी भविष्य के गर्भ में है.

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