तीन यादवों के मुकाबले में क्या पप्पू पास होंगे !

बिहार में मधेपुरा सीट इस बार हाई प्रोफाइल सीटों में से एक है. इस सीट से मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र के सांसद और जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के राष्‍ट्रीय संरक्षक राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव प्रत्याशी हैं.

बता दें कि बिहार की मधेपुरा लोकसभा सीट पर इसबार त्रिकोणीय चुनावी संग्राम की जमीन तैयार हो रही है. यादव बहुल इस संसदीय क्षेत्र में वोटरों के रुख पर पर ही दिग्गजों का भाग्‍य टिका है. मुकाबला त्रिकोणीय है और तीनों दिग्गज एक ही बिरादरी के हैं. यहां देश के दिग्‍गज राजनीतिज्ञों में शुमार शरद यादव की प्रतिष्‍ठा दांव पर लगी है.इस बार जेडीयू छोड़ चुके शरद यादव महागठबंधन की ओर से आरजेडी के उम्मीदवार हैं.

मधेपुरा लोकसभा सीट बिहार के मिथिलांचल इलाके में आती है. 2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से राष्ट्रीय जनता दल के राजेश रंजन / पप्पू यादव ने 3 लाख 68 हजार 937 वोट हासिल किये थे और 56 हजार 209 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी. मधेपुरा लोकसभा सीट पर दूसरे स्थान पर जनता दल (यूनाइटेड) के शरद यादव रहे थे जिन्होंने 3 लाख 12 हजार 728 वोट हासिल किये थे. भारतीय जनता पार्टी के विजय कुमार सिंह 2 लाख 52 हजार 534 वोट पाकर तीसरे तो ठडळअ के इनमें से कोई भी नहीं 21 हजार 924 वोट पाकर चौथें स्थान पर रहे थे.

जब भी बात बिहार की राजनिती की होती है तो कई बाहुबली नेताओं का नाम जहन में आ जाता है. चाहे सीवान के शहाबुद्दीन हो या मोकामा के अनंत सिंह. ऐसा ही एक बाहुबली नाम बिहार की राजनीति में पप्पू यादव का है.

पप्पू यादव के बारे में जानने के लिए 1986-87 के बिहार के दौर में जाना होगा. उन दिनों लालू यादव अपने राजनीतिक जीवन के चढ़ाव पर थे और बिहार में विरोधी दल के नेता बनाना चाहते थे. उस समय उनके मकसद को कामयाब करने में एक शख्स ने उनकी सबसे ज्यादा मदद की थी. वह शख्स पप्पू यादव ही थे. बिहार में राजनीति और अपराध के बीच पनपे इस शख्स को बाहुबली के रूप में जाना जाता है. दरअसल उस वक्त लालू के सामने अनूप लाल यादव, मुंशी लाल और सूर्य नारायण जैसे बड़े नेता विपक्ष का चेहरा बनने की रेस में थे लेकिन पप्पू यदव ने लालू के लिए मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार की. हालांकि अब वह कई बार लालू पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल किया.

दरअसल इसमें कोई शक नहीं कि लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक जमीन तैयार करने में पप्पू यादव का बड़ा हाथ रहा. लालू के लिए बिहार में राजनीतिक जमीन तैयार करते हुए पप्पू यादव कब बिहार में कुख्यात अपराधी बन गए इसका शायद उन्हें भी पता नहीं चला.

मार्क्सवादी क्मयूनिस्ट पार्टी के पूर्व विधायक अजित सरकार की 14 जून, 1998 को पूर्णिया में अज्ञात लोगों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी. इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई. अजित और पप्पू के बीच किसानों के मुद्दे पर मतभेद था. सीबीआई की विशेष अदालत ने 2008 में इस हत्याकांड में पप्पू यादव, राजन तिवारी और अनिल यादव को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. बाद में पटना हाईकोर्ट ने 2008 में पप्पू को रिहा कर दिया था.

पप्पू यादव ने 1990 में सिंहेश्वरस्थान, मधेपुरा से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में बिहार विधानसभा के लिए चुने गए और 1991 में उन्होंने पूर्णिया से 10वीं लोकसभा के लिए चुनाव लड़ा और जीता. वह कई बार आरजेडी, समाजवादी पार्टी और लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़े और जीते है. वह 1991, 1996, 1999 और 2004 में लोकसभा चुनाव जीते हैं.

7 मई 2015, आरजेडी ने पप्पू यादव को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निष्कासित कर दिया जिसके बाद उन्होंने अपनी नई पार्टी जन अधिक्कार पार्टी की स्थापना की.

पप्पू यादव की राजनीतिक कहानी तो काफी मशहूर है लेकिन उनकी प्रेम कहानी भी कम दिलचस्प नहीं. पप्पू यादव की शादी रंजीत से हुई है. प्रेम कहानी पूरी फिल्मी है. पटना की बांकीपुर जेल में बंद वह अक्सर जेल अधीक्षक के आवास से लगे मैदान में लड़कों को खेलते देखा करते थे. इसी दौरान उन्हें रंजीता से प्यार हो गया.

दरअसल रंजीता का भाई विक्की उसी मैदान में खेला करता था. विक्की की कुछ समय में पप्पू यादव से जान-पहचान हो गई. एक दिन वह अपनी फैमली का एलबम पप्पू यादव को दिखा रहा था और तभी पप्पू यादव की नजर रंजीता की तस्वीर पर पड़ी. पप्पयू यादव को रंजीता से प्यार हो गया और जेल से रिहा होने के बाद कई बार उनसे मिलने के लिए टेनिस क्लब में पहुंच जाते जहां वह खेला करते थे.

रंजीता को ये सब पसंद नहीं था. उन्होंने पप्पू यादव को कई बार आने के लिए मना किया. मिलने से रोका और फिर भी नहीं मानने पर कड़े शब्दों में इसका विरोध भी किया. एक बार तो रंजीता ने यहां तक कह दिया कि वे सिख हैं और पप्पू हिंदू. उनके परिवार वाले ऐसा होने नहीं देंगे. हुआ भी ऐसा ही रंजीता के माता-पिता शादी के लिए राजी नहीं थे लेकिन पप्पू यादव के परिवार की तरफ से कोई परेशानी नहीं थी. इसके बाद पप्पू यादव रंजाती की बहन-बहनोई को मनाने चंडिगढ़ गए. हालांकि इसमें भी उनको सफलता नहीं मिली. इसी बीच उन्हें पता चला कि कांग्रेस नेता एसएस अहलूवालिया उनकी मदद कर सकते हैं. पप्पू यादव उनसे मिलने दिल्ली जा पहुंचे और फिर उनसे मदद की गुहार लगाई. इसके बाद किसी तरह रंजीता और पप्पू यादव की शादी तय हुई है. फरवरी 1994 में पप्पू यादव और रंजीता की शादी हो गई. दोनों की शादी खूब धूमधाम से हुई और इस शादी में चौधरी देवीलाल, लालू प्रसाद, डीपी यादव और राज बब्बर भी शामिल हुए.

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